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ध्रुवीय भ्रमिल (पोलर वोर्टेक्स) और शीत की चरम घटनाओं में इसकी भूमिका

जनवरी 2025 के शुरुआती दिनों में, संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) भीषण शीतकालीन तूफानों का सामना कर रहा था, जिससे देश के पूर्वी हिस्से में 6 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हुए। इन तूफानों के कारण तापमान लगभग -50 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया था। 30 राज्यों में मौसम संबंधी चेतावनियां जारी की गईं, जिनमें से सात राज्यों ने आपात स्थिति की घोषणा कर दी। चरम मौसम की यह स्थिति ध्रुवीय भ्रमिल (पोलर वोर्टेक्स), आर्कटिक के चारों ओर तीव्र शीत और घूर्णी पवन का एक क्षेत्र, के दक्षिण की ओर विस्तार के कारण उत्पन्न हुई है। ध्रुवीय भ्रमिल मुख्य रूप से उत्तरी गोलार्ध के मध्य से उच्च अक्षांशों पर स्थित देशों को प्रभावित करता है, जो विशेष रूप से भीषण शीत ऋतु की स्थितियों के प्रति संवेदनशील हैं।

ध्रुवीय भ्रमिल

ध्रुवीय भ्रमिल निम्न दाब और शीतल पवन वाला एक विशाल क्षेत्र है जो पृथ्वी के आर्कटिक और अंटार्कटिक दोनों ध्रुवों में व्याप्त है। 'भ्रमिल' शब्द पवन के वामावर्त प्रवाह को संदर्भित करता है जो शीतल पवन को ध्रुवों तक रोकने में मदद करता है। यह हमेशा ध्रुवों के निकट मौजूद रहता है, हालांकि यह ग्रीष्म ऋतु में मंद और शीत ऋतु में प्रचंड हो जाता है।

प्रकार: ध्रुवीय भ्रमिल दो प्रकार के होते हैं—क्षोभमंडलीय और समतापमंडलीय।

क्षोभमंडलीय ध्रुवीय भ्रमिल वायुमंडल की सबसे निचली परत पर होता है, जो 10-15 किमी.  तक विस्तृत होता है, जहां अधिकांश मौसमी घटनाएं घटित होती हैं। यह भ्रमिल, उत्तरी अक्षांशों में मध्यम मौसम उत्पन्न करता है।

समतापमंडलीय ध्रुवीय भ्रमिल सामान्यतया पृथ्वी की सतह से लगभग 16-48 किमी. ऊपर बनता है। जब समतापमंडलीय ध्रुवीय भ्रमिल स्थिर अवस्था में होता है, तो अति शीतल आर्कटिक पवनें ध्रुवीय क्षेत्रों तक ही सीमित रहती हैं। यद्यपि, जब यह मंद अवस्था में होता है, तो अति शीतल पवनें, इसके गोलाकार उत्तर ध्रुवीय क्षेत्र से आगे बढ़कर दक्षिण में फ्लोरिडा तक फैल जाती हैं।

दोनों प्रकार के ध्रुवीय भ्रमिल वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण और जलवायु को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रभाव: ध्रुवीय भ्रमिल में विक्षोभ से वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव आ सकते हैं, जिससे भारी बर्फबारी (हिमपात), बर्फीले तूफान और हिम झंझावात जैसी घटनाएं हो सकती हैं। जब शीतल आर्कटिक पवन दक्षिण की ओर बढ़ती है, तो वह मध्य अक्षांशों से आने वाली उष्ण, नम पवन से टकरा सकती है, जिससे शीतकालीन तूफानों के लिए आदर्श परिस्थितियां बन सकती हैं।

अमेरिका में, इसके कारण 2010 के स्नोमैगेडन जैसे बड़े हिम झंझावात आ सकते हैं। एक कमजोर भ्रमिल, जेट प्रवाह (स्ट्रीम) को दक्षिण की ओर मोड़ सकता है, जिससे निम्न अक्षांशों पर शीतल पवन प्रवाहित हो सकती है, जिसके परिणामस्वरूप आर्कटिक क्षेत्र में अति शीतल एवं शुष्क पवनें तीव्रता से प्रवाहित हो सकती हैं और तापमान अत्यधिक कम हो सकता है। उत्तरी अमेरिका के अलावा, यूरोप में भी ध्रुवीय भ्रमिल व्यवधानों से संबद्ध भीषण शीत लहरों, जैसा कि 2018 में देखा गया था, का अनुभव किया गया है।

यह विक्षोभ ओजोन क्षरण को तीव्र कर सकता है, खासकर अंटार्कटिका में, और ओजोन छिद्र के निर्माण में योगदान दे सकता है। भारत में, एक कमजोर भ्रमिल पश्चिमी विक्षोभ में वृद्धि कर सकता है, जिससे पश्चिमी हिमालय में बर्फबारी हो सकती है और उत्तरी क्षेत्रों में तापमान में गिरावट आ सकती है।

ध्रुवीय भ्रमिल की संरचना और गतिकी

ध्रुवीय भ्रमिल एक महत्वपूर्ण तूफान है जो वायुमंडल की मध्य और ऊपरी परतों में स्थित होता है, और सामान्यतया आर्कटिक वृत्त के आस-पास केंद्रित होता है। उत्तरी गोलार्ध में शीत ऋतु के समय, यह सामान्यतया उत्तरी ध्रुव के निकट तीव्र हो जाता है। तूफान ध्रुवीय भ्रमिल सहित, प्रायः ऐसे क्षेत्रों में बनते हैं जहां तापमान में उल्लेखनीय अंतर होता है, जो शीत ऋतु  के महीनों में इस स्थिति को और अधिक प्रचंड बनाने में सहायक होता है।

पतझड़ और आरंभिक शीत ऋतु के महीनों में ध्रुवीय क्षेत्र में सौरप्रकाश कम होने के कारण उष्णकटिबंधीय और आर्कटिक वृत्त के बीच तापमान में अंतर बढ़ता जाता है। तापमान का यह वर्धित अंतर ध्रुवीय भ्रमिल को प्रबल बनाता है। जब ध्रुवीय भ्रमिल तीव्र होता है, तो आर्कटिक वृत्त के आस-पास की पश्चिमी पवनें भी तीव्र होती हैं, जो सबसे शीतल पवनों को मुक्त होने से रोकती हैं और उन्हें उत्तरी ध्रुव के पास ही रोक लेती हैं। जैसे-जैसे भ्रमिल मंद होता है, आर्कटिक की कुछ शीतल पवनें अचानक रुककर दक्षिण की ओर बढ़ सकती हैं, जिससे शीतकालीन मौसम की अवधि में वृद्धि हो जाती है।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब ध्रुवीय भ्रमिल प्रचंड और स्थिर होता है, तो यह पृथ्वी  के चारों ओर जेट प्रवाह के वृत्ताकार पथ को बनाए रखने में मदद करता है। ध्रुवीय भ्रमिल की मजबूत निम्न-दाब प्रणाली के बिना, जेट प्रवाह अपना सामान्य पथ बनाए रखने के लिए आवश्यक बल खो देता है और तरंगित और अनियमित हो जाता है। जब उच्च-दाब प्रणालियां हस्तक्षेप करती हैं, तो शीतल पवन धीरे-धीरे अचानक रुककर दक्षिण की ओर जा सकती हैं, और ध्रुवीय भ्रमिल प्रणाली के शेष भाग को अपने साथ ले जा सकते हैं।


ध्रुवीय जेट प्रवाह और ध्रुवीय भ्रमिल

जेट प्रवाह संकरी, तीव्र गति वाली वायु धाराएं हैं जो ऊपरी वायुमंडल में, सामान्यतया लगभग 30,000 फीट की ऊंचाई पर पाई जाती हैं। ध्रुवीय जेट प्रवाह मध्य अक्षांशों से आने वाली ऊष्ण पवनों और ध्रुवों से आने वाली शीतल पवनों के बीच एक सीमा बनाने का काम करती है।

प्रायः लोग ध्रुवीय भ्रमिल को ध्रुवीय जेट प्रवाह समझ लेते हैं, लेकिन इनमें कुछ अंतर हैं। सरल शब्दों में, ध्रुवीय भ्रमिल शीतल पवन की एक संहति होता है, जबकि ध्रुवीय जेट प्रवाह तीव्र गति से चलने वाली पवन का एक पैटर्न है जो भ्रमिल की गति को है और धरती पर मौसम को प्रभावित कर सकता है।


ध्रुवीय भ्रमिल में विक्षोभ और अत्यधिक शीत की घटनाएं

सामान्यतया, जब उत्तर में ध्रुवीय भ्रमिल प्रचंड होता है, तो पश्चिमी पवन का प्रवाह  अमेरिका और दक्षिणी कनाडा के अधिकांश हिस्सों में, आमतौर पर मध्य अक्षांशों के बीच 30° और 60° उत्तर होता है। हालांकि, कभी-कभी, इन क्षेत्रों में तूफान इतना तीव्र हो सकता है  कि पश्चिमी पवन को बाधित और स्थानांतरित कर सकते हैं। तूफान इस सीमा तक तीव्र हो सकते हैं कि वे उष्ण पवन को उत्तर की ओर धकेल देते हैं, जिससे ध्रुवीय भ्रमिल मंद हो जाता है और आर्कटिक वृत्त के आस-पास की तीव्र पवनें भी मंद पड़ जाती हैं। जब ऐसा होता है, तो यह एक श्रृंखला प्रतिक्रिया को उत्प्रेरित कर सकता है जिससे आर्कटिक पवन दक्षिण की ओर निकल जाती है और मध्य अक्षांशों तक पहुंच जाती है।

यद्यपि अमेरिका और कनाडा में तूफानों के कारण तापमान में उतार-चढ़ाव हो सकता है, जिसमें आकस्मिक उष्ण तरंगें और आर्कटिक पवन का संक्षिप्त स्फोट शामिल है, तथापि आर्कटिक पवन के बड़े प्रस्फोट के लिए ध्रुवीय भ्रमिल को मुख्यतः धीमा होना चाहिए जो कई दिनों या सप्ताहों तक जारी रहता है।

प्रत्येक ध्रुवीय भ्रमिल का धीमा होना और उससे संबद्ध आर्कटिक प्रस्फोट भ्रमिल के धीमा  पड़ने और फिर स्थिर होने या प्रचंड होने पर कम हो सकते हैं। हालांकि, अन्य तीव्र शीत प्रस्फोट तब और भी तीव्र हो सकते हैं जब, आर्कटिक पवन को दक्षिण की ओर धकेलने के कारण किंचित मंद भ्रमिल और कमजोर हो जाए।

ध्रुवीय भ्रमिल और जलवायु परिवर्तन

शोधकर्ता इस बात की जांच कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन ध्रुवीय भ्रमिल से संबद्ध शीतल  तापमान की तीव्रता और आवृत्ति को कैसे प्रभावित करता है। वैज्ञानिक अभी भी ध्रुवीय भ्रमिल पर जलवायु परिवर्तन के सटीक प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं, विशेष रूप से यह कि क्या तापमान में वृद्धि के कारण निम्न-दाब प्रणाली कमजोर हो रही है या इसकी स्थानांतरण आवृत्ति में वृद्धि हो रही है। कुछ डेटा संकेत देते हैं कि जलवायु परिवर्तन ध्रुवीय भ्रमिल के स्वरूप को प्रभावित कर सकता है।

वैश्विक तापन (ग्लोबल वॉर्मिंग) ध्रुवीय भ्रमिल को कमजोर कर रहा है क्योंकि पृथ्वी एक समान रूप से गर्म नहीं हो रही है। उत्तरी ध्रुव में अन्य क्षेत्रों की तुलना में बहुत तेजी  से उष्णता बढ़ रही है, जिससे ध्रुवीय भ्रमिल और जेट प्रवाह में विक्षोभ उत्पन्न हो रहा है। परिणामस्वरूप, भ्रमिल के स्थानांतरण का खतरा बढ़ गया है, जिससे यूरोप और उत्तरी एशिया जैसे क्षेत्रों में शीतल पवन फैल रही हैं।

नेशनल ओशनिक एंड एटॅमास्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के अनुसार, आर्कटिक क्षेत्र पृथ्वी के अन्य भागों की तुलना में बहुत तेजी से उष्ण हो रहा है, और तापमान में गिरावट, जो ध्रुवीय भ्रमिल की स्थिरता बनाए रखने में सहायक है, एक कमजोर जेट प्रवाह का कारण बन रही है। उच्च अक्षांशों के गर्म होने से उष्ण मध्य अक्षांशों और ध्रुवीय क्षेत्रों के बीच तापमान में अंतर कम हो जाता है। इससे ध्रुवीय जेट प्रवाह कमजोर एवं अस्थिर हो जाता है, जिससे यह सुदूर दक्षिण की ओर अवपातित हो जाता है और शीतल ध्रुवीय पवन का प्रवाह निचले अक्षांशों की ओर होता है।

ध्रुवीय भ्रमिल की प्रचंडता को कई कारक प्रभावित कर सकते हैं, जिनमें समुद्री बर्फ भी एक है। कुछ प्रतिमान (मॉडल) यह दर्शाते हैं कि समुद्री बर्फ के पिघलने से भ्रमिल कमजोर हो सकता है। दूसरी ओर, वायुमंडल की ऊपरी परतों में उष्णता बढ़ने से यह मजबूत हो सकता है। इसके अतिरिक्त, समुद्र की सतह के तापमान में क्षेत्रीय परिवर्तन भी इसमें अपनी भूमिका निभा सकते हैं। इन अलग-अलग प्रभावों के कारण, प्रतिमान इस बात पर सहमत नहीं हैं कि उत्तरी गोलार्ध के ध्रुवीय भ्रमिल का स्वरूप भविष्य में कैसा होगा।

हाल के अध्ययनों ने उन घटनाओं में वृद्धि को रेखांकित किया है जहां ध्रुवीय भ्रमिल घनी आबादी वाले क्षेत्रों में स्थानांतरित हो गया है। वैज्ञानिक ध्रुवीय भ्रमिल के इस परिवर्तन को और स्पष्ट रूप से समझ रहे हैं, और कई लोग जलवायु परिवर्तन को इसका एक कारण मानते हैं। ऐसे प्रमाण हैं जो दर्शाते हैं कि जैसे-जैसे पृथ्वी उष्ण हो रही है, जेट प्रवाह धीमा हो रहा है और अधिक तरंगित होता जा रहा है। जेट प्रवाह में यह परिवर्तन ध्रुवीय भ्रमिल को प्रभावित करता है, जिससे शीतल तापमान को सुदूर दक्षिण की ओर दबाव बनाने में मदद मिलती है।

वैज्ञानिक आर्कटिक में तेजी से संकुचित होती समुद्री बर्फ से संबद्ध घटनाओं की एक जटिल श्रृंखला को भी चिह्नांकित रहे हैं। ग्रीष्म ऋतु में जैसे-जैसे बर्फ पिघलती है, नीचे का गहन सागर ग्रीष्म ऋतु में अधिक उष्णता अवशोषित करता है। तत्पश्चात यह उष्णता उन पवनों को, जो ध्रुवीय भ्रमिल को बाधित कर सकती हैं, प्रबल बनाते हुए शीत ऋतु में वायुमंडल में निर्मुक्त होती है।

ध्रुवीय भ्रमिल और जलवायु परिवर्तन पर शोध अभी भी जारी है और हालांकि वैज्ञानिक अभी तक किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे हैं, फिर भी इस विचार के प्रति समर्थन बढ़ रहा है। यह अध्ययन का एक तेजी से विकसित हो रहा और विमर्श का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।

ध्रुवीय भ्रमिल वायुमंडल की एक महत्वपूर्ण विशेषता है जो मौसम के स्वरूप का निर्माण करने में, विशेष रूप से शीत ऋतु में, महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ध्रुवीय भ्रमिल की गतिशीलता को समझना चरम मौसम की घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिए बेहतर तैयारी करने हेतु महत्वपूर्ण है।

जैसे-जैसे आर्कटिक क्षेत्र उष्ण होता जा रहा है, चिंता है कि ध्रुवीय भ्रमिल में विक्षोभ अधिक निरंतर और तीव्र हो सकते हैं, जिससे अत्यधिक शीत की घटनाओं में वृद्धि और मौसम के पैटर्न में बदलाव हो सकता है। ध्रुवीय भ्रमिल और जलवायु परिवर्तन के साथ इसके संबंध का निरंतर अध्ययन भविष्य में विनाशकारी मौसम की इन घटनाओं के प्रभावों का पूर्वानुमान लगाने और उनका प्रबंधन करने में महत्वपूर्ण होगा।

ध्रुवीय भ्रमिल की बेहतर समझ हासिल कर, वैज्ञानिक, मौसम विज्ञानी और नीति निर्माता अत्यधिक शीत की घटनाओं के प्रभावों को कम और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल करने के लिए मिलकर काम कर सकते हैं।

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