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पुरुषार्थ

‘पुरुषार्थ’ पद की उत्पत्ति संस्कृत के दो मूल शब्दों—पुरुष अर्थात ‘मनुष्य’ तथा अर्थ अर्थात ‘लक्ष्य’ या ‘उद्देश्य’—से हुई है। अतः, पुरुषार्थ को ‘मानव जाति के उद्देश्य’ अथवा ‘मानव के लक्ष्य’ के रूप में वर्णित किया जा सकता है।

प्राथमिकता के आधार पर निम्नतम से उच्चतम की ओर व्यवस्थित चार पुरुषार्थ हैं: अर्थ, काम, धर्म, और मोक्ष। यद्यपि इन चारों लक्ष्यों को महत्वपूर्ण माना जाता है, तथापि हिंदू दर्शनशास्त्र में धर्म को अर्थ एवं काम से अधिक श्रेष्ठ माना गया है और मानव जीवन के अंतिम लक्ष्य के रूप में मोक्ष को इन तीनों लक्ष्यों से ऊपर रखा गया है।

ऋण

हिंदू दर्शन में ‘ऋण’ शब्द की व्याख्या उन बाध्यताओं या दायित्वों के रूप में की गई है जिनकी पूर्ति मनुष्य द्वारा आजीवन की जानी होती है। ये वे कर्तव्य तथा उत्तरदायित्व हैं जिन्हें मोक्ष प्राप्त करने के लिए पूरा किया जाना चाहिए। यह लोगों की अपने समुदाय/समाज, पूर्वजों, गुरुओं और ईश्वर/दैव से अंतःसंबद्धता को सूचित करता है। हिंदू दर्शन में ऋण के पांच प्रकार हैं:

(i) देव ऋणः यह ईश्वर के प्रति मनुष्य के आभार को संदर्भित करता है। यह आराधना या प्रार्थना, प्रथाओं, तथा नैतिक आचरण के माध्यम से जुड़े रहने का दायित्व है। ऐसा करके मनुष्य उन दैवीय/ईश्वरीय शक्तियों के प्रति अपना आभार एवं अपनी श्रद्धा प्रकट करता है जो ब्रह्मांड को संचालित करती हैं।

 

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