प्रमुख क्षेत्रों में भारत की नीति
दक्षिण एशिया: दक्षिण एशिया के प्रति भारत की विदेश नीति में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है। पहले यह नीति मुख्य रूप से पाकिस्तान पर केंद्रित थी, लेकिन अब इसका जोर व्यापक रूप से क्षेत्रीय स्थिरता और संपर्क (कनेक्टिविटी) को बढ़ावा देने पर है। 'पड़ोसी प्रथम' की नीति इस बदलाव को मूर्त रूप देती है, जिसका उद्देश्य उभरती सुरक्षा चिंताओं और अवसरों का समाधान करते हुए क्षेत्रीय एकीकरण को बढ़ावा देना है। प्रारंभ में, 2014 के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ रचनात्मक संवाद स्थापित करने का प्रयास किया, किंतु उरी और पठानकोट जैसे आतंकी हमलों तथा अनुच्छेद 370 के निरसन जैसी घटनाओं के कारण द्विपक्षीय संबंधों में तीव्र गिरावट आई। इस गिरावट ने भारत को ऐसे क्षेत्रीय सहयोग तंत्रों की ओर उन्मुख होने के लिए प्रेरित किया जो पाकिस्तान द्वारा खड़ी की जाने वाली बाधाओं से मुक्त हों, जैसे कि बिम्सटेक, जो क्षेत्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। इसके साथ ही, भारत ने अतिरिक्त-क्षेत्रीय शक्तियों, विशेषकर अमेरिका, के साथ अपने क्षेत्रीय प्रभाव को सुदृढ़ किया है—जिसका प्रमाण यूएस-नेपाल मिलेनियम चैलेंज कॉर्पोरेशन (एमसीसी) समझौते और श्रीलंका के पश्चिमी कंटेनर टर्मिनल जैसी परियोजनाओं के विकास में अमेरिकी सहायता में देखा जा सकता है। भारत की क्षेत्रीय रणनीति में संपर्क पर भी जोर दिया गया है, जिसमें नेपाल के साथ 2024 का विद्युत निर्यात समझौता और बांग्लादेश के साथ विद्युत व्यापार समझौता जैसे महत्वपूर्ण समझौते शामिल हैं, जो एक प्रमुख क्षेत्रीय केंद्र (हब) के रूप में इसकी भूमिका को मजबूत करते हैं और दक्षिण एशिया में बुनियादी ढांचे और व्यापार संबंधों को बढ़ावा देते हैं। यद्यपि भारत-पाकिस्तान के संबंधों में आई गिरावट के बावजूद, भारत संवाद एवं संधियों के माध्यम से एक औपचारिक संबंध बनाए हुए है। परंतु अप्रैल 2025 में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठन द्वारा पहलगाम में भारतीय नागरिकों (विशेषकर हिंदुओं) पर किए गए प्राणघातक आतंकी हमले के पश्चात भारत ने पाकिस्तान के प्रति कठोर कदम उठाने का फैसला किया, जिसके तहत भारत ने न केवल पाकिस्तान के साथ सभी व्यापारिक और कूटनीतिक संबंधों को स्थगित कर दिया, अपितु उसने ऐतिहासिक सिंधु जल संधि को भी निलंबित कर दिया और पाकिस्तान में आतंकी संगठनों के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही की।