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ग्लोबल सॉयल हेल्थ कॉन्फ्रेंस 2024

जैसा कि वर्ष 2050 तक वैश्विक जनसंख्या का 9.1 अरब तक होना, अर्थात, वर्तमान स्तर से 34 प्रतिशत की अनुमानित वृद्धि अपेक्षित है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार, खाद्य असुरक्षा एक गंभीर वैश्विक समस्या बनी हुई है। विश्व का लगभग 95 प्रतिशत खाद्य उत्पादन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मृदा संसाधनों पर निर्भर है। इसलिए, संधारणीय मृदा प्रबंधन को एक महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय प्राथमिकता के रूप में तेजी से स्वीकृति मिल रही है।

शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं द्वारा मृदा की गुणवत्ता से संबंधित चुनौतियों से निपटने के लिए किए जा रहे निरंतर प्रयासों के बावजूद, पोषक तत्वों की कमी, मृदा क्षरण और मृदा की घटती उर्वरता जैसी समस्याएं खाद्य उत्पादन और पारिस्थितिक तंत्र की संधारणीयता के लिए जोखिम बनी हुई हैं। मृदा स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की क्षति, जल की गुणवत्ता में गिरावट और निर्धनता जैसी व्यापक वैश्विक चुनौतियों के बीच के अंतर्संबंधों ने मृदा विज्ञान को विकास संबंधी चर्चाओं में अग्रणी स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया है। जलवायु परिवर्तन के वर्तमान युग में, विविधता या पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं से समझौता किए बिना, कम भूमि का उपयोग कर अधिक भोजन, ईंधन और फाइबर उत्पादन करने की क्षमता अत्यंत आवश्यक है।

इन बहुआयामी चुनौतियों का समाधान करने के लिए, इंडियन सोसायटी ऑफ सॉयल साइंस ने, इंटरनेशनल यूनियन ऑफ सॉयल यूनियन ऑफ सॉयल साइंसेज, इटली के तत्वावधान में, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी के साथ मिलकर ग्लोबल सॉयल कॉन्फ्रेंस 2024 का आयोजन किया। यह सम्मेलन 19 से 22 नवंबर, 2024 तक राष्ट्रीय कृषि विज्ञान परिसर (एनएएससी), नई दिल्ली में आयोजित किया गया। सम्मेलन का विषय था: केयरिंग फॉर सॉयल्स बियॉन्ड फूड सिक्योरिटी: क्लाइमेट चेंज मिटिगेशन एंड इकोसिस्टम सर्विसेज।

विषयगत विचार-विमर्श 

सम्मेलन में सात प्रमुख विषयों और उनके अनुरूप उप-विषयों पर ध्यान केंद्रित किया गया:

1. मृदा स्वास्थ्य और पारिस्थितिक तंत्र सेवाएं: इस विषय (थीम) के अंतर्गत मृदा स्वास्थ्य के आकलन और पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं पर इसके प्रभाव की जांच की गई। पारिस्थितिक तंत्र उत्पादकता को बनाए रखने के महत्वपूर्ण घटकों के रूप में मृदा की जैव विविधता और पोषण चक्र पर चर्चा की गई।

2. जलवायु परिवर्तन और मृदा स्वास्थ्य: इस विषय पर की गई चर्चा में मृदा के गुणों, कार्बन एवं नाइट्रोजन चक्रों, तथा जल और एनर्जी फुटप्रिंट [इसे मानवीय संवहनीयता पर पर्यावरणीय दबाव और ऊर्जा उपभोग तथा उत्पादन के प्रभाव के मापन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है] पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को संबोधित किया गया। अनुकूलन और शमन दोनों के लिए रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया गया।

3. संधारणीय मृदा प्रबंधन: कॉन्फ्रेंस के सत्रों में निम्नीकृत मृदा हेतु नवाचारी पुनर्स्थापन पद्धतियों, पारिस्थितिक रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में मृदा प्रबंधन, मृदा प्रदूषण के उपचार के लिए कृषि और औद्योगिक अपशिष्ट की उपयोगिता तथा पद्धतियों पर बल दिया गया।

4. प्रकृति-सकारात्मक मृदा प्रबंधन: मृदा के लचीलेपन और पारिस्थितिक तंत्र की पुन:र्प्राप्ति की पद्धति में सुधार के प्रस्ताव के रूप में पादप-आधारित पारिस्थितिक पुनर्स्थापन तथा प्राकृतिक या जैविक कृषि प्रणालियों को प्रस्तुत किया गया।

5. डिजिटल मृदा विज्ञान और परिशुद्ध संसाधन प्रबंधन: परिशुद्ध कृषि और संधारणीय निर्णय लेने हेतु सक्षमकर्ताओं के रूप में उन्नत डिजिटल उपकरणों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मृदा के डिजिटल मानचित्रण की भूमिका पर चर्चा की गई।

6. मृदा से संबद्ध शिक्षा और जागरूकता: शैक्षणिक संस्थानों और समुदायों के बीच मृदा विज्ञान को बढ़ावा देने के लिए नवीन शैक्षिक रणनीतियों का मूल्यांकन किया गया।

7. मृदा प्रबंधन के लिए नीति और शासन: मृदा संधारण के महत्वपूर्ण घटकों के रूप में राष्ट्रीय और वैश्विक नीति एकीकरण, स्थानीय शासन, सामुदायिक भागीदारी और सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर विचार-विमर्श किया गया।

कतिपय प्रमुख अनुशंसाएं

सम्मेलन में मृदा स्वास्थ्य में सुधार और दीर्घकालिक संधारणीयता सुनिश्चित करने के लिए कई व्यापक सुझाव दिए गए। इसके अतिरिक्त, सम्मेलन में विशिष्ट क्षेत्रों और हस्तक्षेपों के लिए लक्षित अनुशंसाएं भी जारी की गईं।

सामान्य अनुशंसाएं: • मृदा को अपरदन, पोषक तत्वों की क्षति एवं संदूषण से बचाने के लिए कृषि पारिस्थितिकी, संरक्षण जुताई, फसल चक्र और जैविक कृषि जैसी प्रथाओं को बढ़ावा देना आवश्यक है।

  • मृदा की जैव विविधता, विशेष रूप से सूक्ष्मजीव समुदायों और अन्य मृदा जीवों, का संरक्षण भी समान रूप से महत्वपूर्ण है जो उर्वरता एवं लचीलेपन में वृद्धि करते हैं।
  • जलवायु परिवर्तन का शमन करने में मृदा में कार्बन प्रच्छादन एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में उभरा है। कृषि वानिकी और पुनर्योजी कृषि जैसी तकनीकें मृदा में कार्बन भंडारण को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकती हैं। मृदा में कार्बन प्रच्छादन, कार्बन अपघटन की सुग्राहिता और मृदा समुच्चयों में कार्बन के स्थिरीकरण पर विशेष बल दिया गया।
  • एकीकृत मृदा और जल प्रबंधन की आवश्यकता पर बल दिया गया। जल प्रयोग की सतत पद्धतियां जलभराव, लवणीकरण और सूखे को रोकने में मदद करती हैं—ये सभी मृदा अपरदन में योगदान करते हैं।
  • पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी कृषि के महत्वपूर्ण घटकों के रूप में उर्वरक संतुलित प्रयोग और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम) को अपनाने की अनुशंसा की गई। आईएनएम बढ़ती लागत को कम करने में मदद करता है और दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों को प्रोत्साहित करता है।
  • डेटा सृजन, निगरानी और सामंजस्य के साथ मृदा के व्यापक डेटाबेस और निगरानी प्रणालियों की मांग पर जोर दिया गया। सभी संस्थानों में भूमि निम्नीकरण को समान रूप से परिभाषित एवं मूल्यांकित करने और भूमि निम्नीकरण के मानचित्रण के लिए उच्च-गुणवत्ता वाले सेंसर डेटा में निवेश करने की अनुशंसा की गई।
  • मृदा के स्थायी प्रबंधन के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल में सुधार हेतु शिक्षा और क्षमता निर्माण को मजबूत किया जाना चाहिए।
  • मानव और पर्यावरणीय स्वास्थ्य में मृदा की मुख्य भूमिका को रेखांकित करने के लिए जन जागरूकता अभियान और हितधारकों के समर्थन का प्रस्ताव रखा गया।
  • नीतिगत समर्थन अत्यंत महत्वपूर्ण है। मृदा स्वास्थ्य को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विधिक प्रणालियों, जो संधारणीय भूमि उपयोग का समर्थन करती हैं, में शामिल करने, और मृदा संरक्षण तथा मृदा-अनुकूल पद्धतियों को अपनाने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करने की मांग की गई। इसके अलावा, एक व्यापक राष्ट्रीय मृदा प्रबंधन रणनीति के विकास के लिए अंतर-मंत्रालयी सहयोग को बढ़ावा देने की वकालत भी की गई।

विशिष्ट अनुशंसाएं: • मृदा स्वास्थ्य कार्ड में भौतिक और जैविक गुणों को शामिल करने की अनुशंसा की गई ताकि अधिक व्यापक मूल्यांकन प्रदान किया जा सके।

  • अजैविक भार के मानचित्रों को स्थान-विशिष्ट दबाव न्यूनीकरण रणनीतियों के साथ संबद्ध किया जाना चाहिए, और प्रमुख उत्पादन प्रणालियों पर दबाव डालने वाले प्रमुख कारकों पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
  • मशीन लर्निंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के साथ यांत्रिक उपागमों को संयोजित करने वाले हाइब्रिड मॉडल, विभिन्न अजैविक दबावों के प्रभाव का मूल्यांकन करने की संभावना रखते हैं।
  • विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में इन्फोक्रॉप (InfoCrop) जैसे उपकरणों में संशोधित जुताई और अवशेष पलवार (मल्च) प्रतिरूपक की पुष्टि करने की आवश्यकता है ताकि बदलते जलवायु परिदृश्यों में उनकी अनुकूलनशीलता का आकलन किया जा सके।
  • कृषि प्रबंधन के लिए एक बहु-स्तरीय उपागम अपनाने की अनुशंसा की गई, जिसमें भू-दृश्य-स्तरीय जल प्रबंधन, भूखंड/खेत-स्तरीय मृदा देखभाल, ग्राम-स्तरीय मशीनरी, परिवार-स्तरीय बीज उपलब्धता और पंचायत-स्तरीय कृषि वानिकी को शामिल किया जाना चाहिए।
  • भविष्य के जोखिमों को ध्यान में रखते हुए, जल-संबंधी जलवायु अनुकूलन रणनीतियों को आधारिक अवसंरचना की अभिकल्पना में मुख्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए।
  • औद्योगिक अपशिष्ट निर्वहन के लिए नियामक उपायों को कठोर बनाने की आवश्यकता है और उल्लंघनकर्ताओं के लिए भारी दंड का प्रावधान होना चाहिए।
  • भारी धातु संदूषण के लिए उपचार तकनीकों को मृदा के स्थान, गुणवत्ता और खाद्य श्रृंखला की भागीदारी के आधार पर मानकीकृत किया जाना चाहिए।
  • क्षेत्रीय और स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने के लिए मृदा प्रबंधन के विकेंद्रीकरण को ग्रामीण आवश्यकताओं के अनुरूप सेवाएं प्रदान करने के एक साधन के रूप में चिह्नित  किया गया।
  • मृदा आर्द्रता के समीपस्थ संवेदन हेतु हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर नवाचारों जैसी उन्नत प्रणालियों का प्रयोग करने की अनुशंसा की गई। मृदा के डिजिटल मानचित्रों और निर्णय-समर्थन प्रणालियों के माध्यम से प्रमाणित ये प्रणालियां सिंचाई और पोषक तत्व प्रबंधन की सबसे अनुकूल विधि का प्रयोग कर सकती हैं।
  • बारहमासी चावल के कृषि उत्पादन का मूल्यांकन कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में प्रतिरूपण और निर्णय-समर्थन प्रणालियों के माध्यम से किया जाना चाहिए।
  • खड्ड भूमि और लवण-प्रभावित मृदाओं के प्रबंधन के लिए संरक्षण और सुधार हेतु अनुकूलित, लागत-प्रभावी तकनीकों की आवश्यकता है।
  • भूमि उपयोग नियोजन और पारिस्थितिक तंत्र के प्रबंधन हेतु नीति-निर्माण में कृषि-पारिस्थितिकी संबंधी उपागमों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • बंजर भूमि का रणनीतिक पुनरुद्धार किया जाना चाहिए और उनकी कार्बन प्रच्छादन क्षमता का दोहन किया जाना चाहिए।
  • मृदा संबंधी शिक्षा को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) में शामिल किया जाना चाहिए ताकि भावी पीढ़ियों को मृदा और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की देखभाल के बारे में जागरूक, और पर्यावरणीय मुद्दों, भूमि निम्नीकरण, जलवायु परिवर्तन जैसी वर्तमान एवं भविष्य की चुनौतियों का समाधान किया जा सके।
  • बागवानी में दीर्घकालिक कार्बन-कुशल पद्धतियां, उदाहरणार्थ निम्नीकृत बेसाल्टी भूमि में फल-आधारित प्रणालियां, कार्बन प्रच्छादन को बढ़ावा देती हैं और कार्बन क्रेडिट के अवसर प्रदान करती हैं।
  • भारी धातुओं से संदूषित मृदा के लिए मानकीकृत उपचार विधियां विकसित करना आवश्यक है, जिसमें विशिष्ट स्थान, मृदा की गुणवत्ता, संदूषित पदार्थों के जैव सुलभ रूप और खाद्य श्रृंखला पर उनके संभावित प्रभाव जैसे कारकों को ध्यान में रखा जाए। इस तरह के अनुकूलित उपागम दीर्घकालिक और प्रभावी उपचार परिणाम सुनिश्चित करने में सहायक होंगे।
  • बायोमास के अपशिष्ट और निम्न-श्रेणी के खनिजों को ऑरिगेनो-खनिज उर्वरकों में पुनर्चक्रित करने से रासायनिक उर्वरकों, विशेष रूप से फॉस्फोरस और पोटैशियम, पर निर्भरता कम हो सकती है।
  • प्रकृति-सकारात्मक कृषि पद्धतियां सीमांत भूमि पर उपज एवं गुणवत्ता दोनों में सुधार लाने में प्रभावी सिद्ध हुई हैं, जो जलवायु के लचीलेपन तथा मृदा के पुनःस्थापन में योगदान देती हैं।
  • सभी विश्वविद्यालयों में प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन हेतु उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने से मानव संसाधन विकास में उल्लेखनीय सहायता मिल सकती है।
  • तटीय क्षेत्रों में, मृदा में लचीलेपन और जैव विविधता को बढ़ावा देने के लिए विविधीकृत कृषि और कार्बन कृषि की अनुशंसा की गई।
  • सूक्ष्म पोषक तत्व वितरण के लिए मृदा परीक्षण डेटा, क्षेत्र विश्लेषण के लिए ड्रोन आधारित मानचित्र और जुताई एवं फसल चक्रण को अनुकूलित करने के लिए पूर्वानुमान मॉडल का प्रयोग कर तकनीकी एकीकरण, मृदा स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार ला सकता है।
  • नैनो-उपचार, जीन एडिटिंग के साथ पादप उपचारण (फाइटोरेमेडिएशन), जैवोचार अनुप्रयोग, मृदा विश्लेषण के लिए ओमिक्स तकनीकें [ओमिक्स उन विधियों को संदर्भित करता है जिनका प्रयोग बड़े पैमाने पर जैविक अणुओं का विश्लेषण करने के लिए किया जाता है, और जो जीवों की संरचना, कार्य और गतिशीलता के बारे में व्यापक जानकारी प्रदान करती हैं।] और मृदा के हवाई मानचित्रण जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों को मृदा उपचार और प्रबंधन में उनकी परिवर्तनकारी क्षमता के रूप में चिह्नित किया गया।
  • मृदा सुरक्षा की अवधारणा को बढ़ावा दिया गया, जिसमें परस्पर संबद्ध पांच आयाम शामिल थे: (i) क्षमता, (ii) स्थिति, (iii) पूंजी, (iv) संपर्कता, और (v) संहिताकरण। ये न केवल वैज्ञानिक और आर्थिक विचारों को, बल्कि नीतिगत और विधिक आयामों को भी दर्शाते हैं।

निष्कर्ष

यह सम्मेलन मृदा स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक तंत्र की संधारणीयता जैसे तात्कालिक अंतर्संबंधित मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए एक समसामयिक और व्यापक मंच के रूप में कार्य करता है। बहु-विषयक अनुसंधान, एकीकृत नीति समर्थन, सामुदायिक सहभागिता और तकनीकी नवाचार पर ध्यान केंद्रित कर, इस सम्मेलन ने संधारणीय विकास के व्यापक वर्णन में मृदा के महत्व को स्पष्ट किया। इस सम्मेलन से प्राप्त अनुशंसाओं का उद्देश्य कृषि, पर्यावरण और जलवायु प्रबंधन में भविष्य की कार्रवाइयों का मार्गदर्शन करना है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक लचीली और उत्पादक मृदा प्रणाली सुनिश्चित हो सके।

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