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भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) द्वारा 21 दिसंबर, 2024 को देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान में भारत वन स्थिति रिपोर्ट (आईएसएफआर) 2023 जारी की गई। यह रिपोर्ट भारत के वन एवं वृक्ष संसाधनों के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करती है, जिसमें भारत में वनावरण तथा विभिन्न वनों के प्रमुख पहलुओं से संबंधित विशिष्ट विषयगत जानकारी भी शामिल है।

भारतीय वन सर्वेक्षण

भारत वन सर्वेक्षण (एफएसआई) पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा प्रशासित एक संस्थान है। इसे 1987 से द्विवार्षिक आधार पर भारत वन स्थिति रिपोर्ट तैयार करने हेतु अधिदेशित किया गया है। भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 इस शृंखला में इसके द्वारा प्रकाशित 18वीं रिपोर्ट है।

भारत वन सर्वेक्षण सुदूर संवेदन उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों तथा राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केन्द्र (एनआरएससी), हैदराबाद द्वारा किए गए भू-आकलन के विश्लेषण के आधार पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए देश के वन और वृक्ष संसाधनों का पूर्ण आकलन करता है। तत्पश्चात, भारत वन स्थिति रिपोर्ट में परिणामों, यथा—भारत के वनों में वनाग्नि तथा कृषि वानिकी के विवरण सहित वनावरण, वृक्ष आवरण, स्टॉक (निधि) में हुई वृद्धि, कच्छ वनस्पति के आवरण, और कार्बन स्टॉक का विवरण दिया जाता है। इस नवीनतम रिपोर्ट में भारतीय वन सर्वेक्षण ने भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2021 में सम्मिलित 636 जिलों की तुलना में, 751 जिलों के लिए वनावरण का डेटा प्रदान किया है, जिसमें वे जिले भी शामिल हैं जिन्हें हाल ही में बनाया गया है।

आईएसएफआर की आवश्यकता

भारत वन स्थिति रिपोर्ट विभिन्न नीतियों का निर्माण तथा उनकी समीक्षा करने, वन संसाधनों की निगरानी करने, और वन संसाधनों के इष्टतम प्रयोग में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत वन स्थिति रिपोर्ट के निष्कर्ष निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति भी करते हैं:

  • राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) के लक्ष्यों को निर्धारित करना
  • खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) को सूचित करने के माध्यम से वन संसाधनों के वैश्विक आकलन में योगदान देना
  • भूमि उपयोग, भूमि उपयोग परिवर्तन एवं वानिकी (एलयूएलयूसीएफ) क्षेत्र के अंतर्गत वन्य भूमि के लिए यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज को ग्रीन हाउस गैस (जीएचजी) इन्वेंट्री प्रदान करना।

रिपोर्ट के मुख्य तथ्य

वन एवं वृक्ष आवरणः भारत के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग लगभग 25.17 प्रतिशत, अर्थात 8,27,356.95 वर्ग किमी. क्षेत्र वन एवं वृक्षावरण से आच्छादित है। इसमें से, कुल 7,15,342.61 वर्ग किमी. क्षेत्र केवल वनाच्छादित है, जबकि वृक्ष आवरण कुल 1,12,014.34 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला है। संक्षेप में, देश में वनावरण 21.76 प्रतिशत, जबकि वृक्षावरण 3.41 प्रतिशत भू-क्षेत्र में विस्तारित हैं।

भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार, 2021 में आयोजित पूर्ववर्ती आकलन की तुलना में, भारत में वनावरण में लगभग 156.41 वर्ग किमी. क्षेत्र की वृद्धि हुई है।

यह रिपोर्ट आईएसएफआर 2021 की तुलना में, भारत के वृक्षावरण में 1,445.81 वर्ग किमी. की वृद्धि दर्शाती है।

भौगोलिक क्षेत्रफल की दृष्टि से, भारत में मध्य प्रदेश में वनावरण और वृक्षावरण, जिसका क्षेत्रफल 85,724 वर्ग किमी. है, सबसे अधिक है। इस श्रेणी में क्रमशः अरुणाचल प्रदेश (67,083 वर्ग किमी.) दूसरे और महाराष्ट्र (65,383 वर्ग किमी.) तीसरे स्थान पर हैं।

वनावरण और वृक्षावरण दोनों में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज करने वाला राज्य छत्तीसगढ़ (683.62 वर्ग किमी.) है। इसके बाद उत्तर प्रदेश, ओडिशा और राजस्थान का स्थान है, जिनके क्षेत्रफल में क्रमशः 559.19 वर्ग किमी., 558.57 वर्ग किमी. और 394.46 वर्ग किमी. की वृद्धि हुई है।

वन और वृक्षावरण में सबसे अधिक कमी दर्ज करने वाला राज्य मध्य प्रदेश (612.41 वर्ग किमी.) है। इस श्रेणी में क्रमशः कर्नाटक, लद्दाख और नागालैंड अन्य ऐसे राज्य हैं, जिनके क्षेत्रफल में क्रमशः 459.36 वर्ग किमी., 159.26 वर्ग किमी. और 125.22 वर्ग किमी. की कमी दर्ज की गई।

सर्वाधिक वृक्षावरण (अर्थात 14,524.88 वर्ग किमी.) वाला राज्य महाराष्ट्र है। इसके बाद राजस्थान और उत्तर प्रदेश हैं, जिनका वृक्षावरण क्रमशः 10,841.12 वर्ग किमी. और 8,950.92 वर्ग किमी. है। कुल मिलाकर, भारत के लगभग 21 राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में वृक्षावरण में वृद्धि दर्ज की गई। इससे कृषि वानिकी के विकास को बढ़ावा मिलेगा।

अभिलिखित वन क्षेत्र में वनावरण में सर्वाधिक वृद्धि (अर्थात 242 वर्ग किमी.) दर्ज करने वाला राज्य मिजोरम है। इस श्रेणी में क्रमशः गुजरात (180 वर्ग किमी. की वृद्धि के साथ) दूसरे और ओडिशा (152 वर्ग किमी. की वृद्धि के साथ) तीसरे स्थान पर हैं।

पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र: पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र (डब्ल्यूजीईएसए) लगभग 60,285.61 वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत है, जिसमें से 73 प्रतिशत (44,043.99 वर्ग किमी.) क्षेत्र वनावरण के अंतर्गत है।

एफएसआई ने डब्ल्यूजीईएसए के वनावरण में हुए परिवर्तनों का एक दशक तक दीर्घकालिक  विश्लेषण किया और पाया कि पिछले दस वर्षों में वनावरण में 58.22 वर्ग किमी. का कुल ह्रास हुआ है। जहां 3,465.12 वर्ग किमी. तक अत्यंत सघन वनों का विस्तार हुआ, वहीं मध्यम सघन वनों में 1,043.23 वर्ग किमी. और खुले वनों में 2,480.11 वर्ग किमी. का ह्रास हुआ।

भारत में कच्छ (मैंग्रोव) वनस्पति आवरण: भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 4,991.68 वर्ग किमी. (0.15 प्रतिशत) क्षेत्र में कच्छ है। इसमें से अत्यंत सघन कच्छ आवरण लगभग 1,463.97 वर्ग किमी. (29.33 प्रतिशत) है; मध्यम सघन कच्छ आवरण लगभग 1,500.84 वर्ग किमी (30.07 प्रतिशत) है; और शेष 2,026.87 वर्ग किमी. (40.60 प्रतिशत) क्षेत्र खुले कच्छ से आच्छादित है।

आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में कच्छ आवरण क्षेत्र में क्रमशः 13.01 वर्ग किमी. और 12.39 वर्ग किमी. की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

2021 के आईएसएफआर की तुलना में, इस रिपोर्ट में भारत के कच्छ आवरण क्षेत्र में 7.43 वर्ग किमी. की गिरावट दर्ज की गई। गुजरात में कच्छ आवरण क्षेत्र में 36.39 वर्ग किमी. की उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।

प्रमुख महानगरों में वनावरण

छह प्रमुख महानगरों में कुल वनावरण क्षेत्र 511.81 वर्ग किमी. है, जो उनके भौगोलिक क्षेत्र का 10.26 प्रतिशत है। दिल्ली में सबसे अधिक वनावरण क्षेत्र (194.15 वर्ग किमी.) है, उसके बाद क्रमशः मुंबई (110.84 वर्ग किमी.) और बेंगलुरु (89.61 वर्ग किमी.) का स्थान है। नवीनतम आकलन में 2.09 वर्ग किमी. की शुद्ध वृद्धि दर्ज की गई, जिसमें अहमदाबाद में सबसे अधिक वृद्धि (5.48 वर्ग किमी.) हुई , जबकि चेन्नई (-2.64 वर्ग किमी.) और हैदराबाद (-1.61 वर्ग किमी.) में सबसे अधिक कमी दर्ज की गई।

वनाग्नि: 2021-22 और 2022-23 के अग्नि मौसमों की तुलना में, 2023-24 के अग्नि मौसम के दौरान अग्नि हॉटस्पॉट (महत्वपूर्ण गतिविधि, या खतरे का स्थान) की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आई, जो 2,03,544 थी। पिछले दो मौसमों में, अग्नि हॉटस्पॉट क्रमशः 2,23,333 और 2,12,249 थे। उल्लेखनीय है कि अग्नि हॉटस्पॉट का पता लगाने के लिए SNPP-VIIRS  संवेदक (सेंसर) का प्रयोग किया गया था। SNPP और VIIRS क्रमशः सुओमी नेशनल पोलर-ऑर्बिटिंग पार्टनरशिप तथा विजिबल इन्फ्रारेड इमेजिंग रेडियोमीटर सूट को निरूपित करते हैं।

2023-24 के अग्नि मौसम के दौरान, उत्तराखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में आग लगने की सबसे अधिक घटनाएं दर्ज की गईं।

राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार जले हुए क्षेत्रों का मानचित्रण, जिसमें 705 संरक्षित क्षेत्रों की वनाग्नि के आंकड़े भी शामिल थे, किया गया जो नीति निर्माताओं को दिशा-निर्देशों में सुधार करने में सहायता करने के लिए बहुमूल्य आंकड़े प्रदान करते हैं।

वर्धमान निधि/भंडार (काष्ठ संसाधन): यह आकलित किया गया है कि देश में काष्ठ का कुल भंडार (स्टॉक) 6,429.64 मिलियन घन मीटर (Mm3) है। इसमें से वन क्षेत्रों के भीतर काष्ठ संसाधनों के भंडार में 4,478.89 मिलियन घन मीटर की, जबकि अभिलिखित वन क्षेत्रों के बाहर 1,950.75 मिलियन घन मीटर की वृद्धि दर्ज की गई।

आईएसएफआर 2021 में प्रस्तुत आकलन की तुलना में, भारत के बढ़ते काष्ठ भंडार में 262.32 मिलियन घन मीटर (4.25 प्रतिशत) की वृद्धि हुई है। इसमें से वनों के भीतर काष्ठ भंडार में 90.92 मिलियन घन मीटर (2.07 प्रतिशत) वृद्धि हुई, जबकि वन क्षेत्रों के बाहर 171.40 मिलियन घन मीटर (9.63 प्रतिशत) की वृद्धि दर्ज की गई।

रिपोर्ट में प्रस्तुत आकलन के अनुसार घरेलू स्तर पर वन क्षेत्रों में काष्ठ भंडार में प्रति हेक्टेयर 86.10 घन मीटर की वृद्धि हुई है।

रिपोर्ट में उल्लिखित है कि वनों के भीतर काष्ठ भंडार में सबसे अधिक वृद्धि अरुणाचल प्रदेश में हुई जो 457.83 मिलियन घन मीटर थी। इस श्रेणी में वृद्धि दर्ज करने वाले राज्य क्रमशः उत्तराखंड (400.02 मिलियन घन मीटर के आयतन के साथ), छत्तीसगढ़ (398.54 मिलियन घन मीटर के आयतन के साथ) और मध्य प्रदेश (387.18 मिलियन घन मीटर के आयतन के साथ) हैं।

इसके अलावा, दर्ज वन क्षेत्रों के बाहर काष्ठ भंडार में सबसे अधिक वृद्धि महाराष्ट्र में दर्ज की गई जो 213.93 मिलियन घन मीटर है। इस श्रेणी में वृद्धि दर्ज करने वाले राज्य क्रमशः कर्नाटक (137.62 मिलियन घन मीटर के आयतन के साथ), मध्य प्रदेश (130.46 मिलियन घन मीटर के आयतन के साथ) और छत्तीसगढ़ (129.04 मिलियन घन मीटर के आयतन के साथ) हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में प्रति हेक्टेयर वनों में सबसे अधिक वृद्धिशील भंडार दर्ज किए गए जो 219.46 घन मीटर है। इस श्रेणी में वृद्धि दर्ज करने वाले राज्य क्रमशः केरल (179.78 घन मीटर के आयतन के साथ) और उत्तराखंड (164.39 घन मीटर के आयतन के साथ) हैं।

इसके अलावा, केंद्र-शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर में प्रति हेक्टेयर वनों में सबसे अधिक वृद्धिशील स्टॉक है, जिसकी मात्रा 296.22 घन मीटर है। इस श्रेणी में क्रमशः केंद्र-शासित प्रदेश अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (246.61 घन मीटर के आयतन के साथ) और चंडीगढ़ (78.64 घन मीटर के आयतन के साथ) हैं।

बांस-धारित क्षेत्र: कुल बांस धारित क्षेत्र लगभग 1,54,670 वर्ग किमी. अनुमानित किया गया है। पूर्ववर्ती वन स्थिति रिपोर्ट 2021 की तुलना में, वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार, देश के बांस-धारित क्षेत्र में 5,227 वर्ग किमी. की वृद्धि हुई है।

20,421 वर्ग किमी. के सर्वाधिक बांस-धारित क्षेत्र के साथ, मध्य प्रदेश शीर्ष पर है। इस श्रेणी में आने वाले राज्य क्रमशः अरुणाचल प्रदेश (18,424 वर्ग किमी.), महाराष्ट्र (13,572 वर्ग किमी.) और ओडिशा (12,328 वर्ग किमी.) हैं।

बांस-धारित क्षेत्र में सबसे अधिक वृद्धि (2,685 वर्ग किमी.) अरुणाचल प्रदेश में दर्ज की गई। इस श्रेणी में क्रमशः दूसरे स्थान पर मध्य प्रदेश है, जिसके बांस-धारित क्षेत्र में 2,027 वर्ग किमी. की वृद्धि हुई है।

इसके अलावा, कर्नाटक (1,290 वर्ग किमी.) और मणिपुर (860 वर्ग किमी.) में बांस-धारित क्षेत्र में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई।

भारत में कृषि वानिकी प्रणाली

  • आईएसएफआर 2023 के अनुसार, घरेलू स्तर पर कृषि वानिकी के लिए प्रयुक्त कुल हरित वृक्ष आवरण का क्षेत्रफल 1,27,590.05 वर्ग किमी. है। एक दशक पहले 2013 में जारी आईएसएफआर की तुलना में, भारत में कृषि वानिकी के लिए प्रयुक्त कुल हरित वृक्ष आवरण में 21,286.57 वर्ग किमी. (20.02 प्रतिशत) की वृद्धि देखी गई।
  • कृषि वानिकी के भंडार में सबसे अधिक वृद्धि महाराष्ट्र में (136-45 मिलियन घन मीटर) दर्ज की गई , इसके बाद क्रमशः कर्नाटक, ओडिशा और राजस्थान का स्थान है। केंद्र-शासित प्रदेशों में, जम्मू और कश्मीर शीर्ष पर है, उसके बाद अंडमान निकोबार द्वीप समूह और दादरा एवं नगर हवेली तथा दमन और दीव का स्थान है।
  • 2013 में कृषि वानिकी की सबसे प्रचलित प्रजातियां एरेका कैटेचू और कोकास न्यूसीफोरा थी जो कि 2023 में बदलकर प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा और यूकेलिप्टस हो गई हैं, जबकि मैंगीफेरा इंडिका और एजाडिरेक्टा इंडिका कृषि वानिकी की प्रमुख प्रजाति बनी हुई हैं।

कार्बन स्टॉक और जलवायु प्रतिबद्धताएं

आईएसएफआर 2023 के अनुसार, अनुमानतः 2023 तक कार्बन स्टॉक 7,285.5 मीट्रिक टन (एमटी) है। पूर्ववर्ती आईएसएफआर की तुलना में, कार्बन स्टॉक में 81.5 मीट्रिक टन की वृद्धि देखी गई। यह भी प्राकलित किया गया है कि कार्बन स्टॉक में सालाना 40.75 मीट्रिक टन की वृद्धि होगी। इसके अलावा, कार्बन स्टॉक वृद्धि सबसे अधिक (1,021 मीट्रिक टन) अरुणाचल प्रदेश में होने की संभावना है। इस श्रेणी में आने वाले अन्य राज्य क्रमशः मध्य प्रदेश (608 मीट्रिक टन), छत्तीसगढ़ (505 मीट्रिक टन) और महाराष्ट्र (465 मीट्रिक टन) हैं।


क्या आप जानते हैं?

वन कार्बन का सबसे बड़ा हिस्सा मृदा जैव कार्बन (मृदा के जैविक पदार्थों में निहित कार्बन) है, जो 55.06 प्रतिशत है।


आईएसएफआर 2023 के अनुसार, भारत में 30.43 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के समतुल्य कार्बन सिंक का निर्माण किया जा चुका है। अर्थात, 2005 से अब तक भारत 2.29 बिलियन टन अतिरिक्त कार्बन सिंक प्राप्त कर चुका है।

भारत जलवायु परिवर्तन पर किए गए पेरिस समझौते के तहत एनडीसी (राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान) हेतु की गई प्रतिबद्धताओं के अंतर्गत में अपने वन और वृक्ष आवरण में वृद्धि करने के माध्यम से 2030 तक 2.5-3 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के समतुल्य एक अतिरिक्त कार्बन सिंक का निर्माण करने के लिए प्रतिबद्ध है।

भारत में वनावरण और वृक्षावरण

       श्रेणी

 क्षेत्रफल  (वर्ग किमी.)

भौगोलिक क्षेत्रफल का प्रतिशत

वनावरण

7,15,342.61

21.76

वृक्षावरण

1,12,014.34

3.41

कुल वन एवं वृक्ष आवरण

8,27,356.95

25.17

झाड़ी

43,622.64

1.33

गैर वन

24,16,489.29

73.50

देश का भौगोलिक क्षेत्र

32,87,468.88

100.0

 

वानिकी मापदंडों के निर्धारण हेतु वनों की विशेषताएं

1. मृदा स्वास्थ्य: आईएसएफआर 2023 के अनुसार, झाड़-झंखाड़ (अंडरग्रोथ—ऐसी वनस्पति जो किसी वन या वनाच्छादित क्षेत्र में पेड़ों के नीचे उगती है।) की दर 2013 के 20.32 प्रतिशत की तुलना में अब बेहतर, अर्थात 25.58 प्रतिशत, है। इसके अलावा, घास का आवरण भी बेहतर, अर्थात 2013 के 15.64 प्रतिशत की तुलना में अब 17.21 प्रतिशत, हुआ है। ह्यूमस का स्तर भी 2013 के 11.43 प्रतिशत से बढ़कर 2023 में 18.04 प्रतिशत हो गया है। यह दर्शाता है कि मृदा स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार, 2013 में उथली से गहन मृदा के 83.53 प्रतिशत से बढ़कर 2023 में 87.16 प्रतिशत, हुआ है।

इसके अलावा, मृदा जैव कार्बन में भी उल्लेखनीय सुधार, अर्थात मृदा में 2013 के 55.85 टन प्रति हेक्टेयर की तुलना में 2023 में 56.08 टन प्रति हेक्टेयर जैव कार्बन, पाया गया है।

2. जैविक प्रभाव: जैविक प्रभावों में पल्लव, चराई, स्कंधन (पोलार्डिंग), कटाई, अवैध पातन, मानव जनित आग आदि शामिल हैं, जो वनों को प्रभावित करते हैं। ये प्रभाव 2013 के 31.28 प्रतिशत से घटकर 2023 में 26.66 प्रतिशत हो गए हैं। उदाहरण के लिए, चराई का स्तर 2013 के 41.04 प्रतिशत से घटकर 2023 में 35.79 प्रतिशत रह गया है। परिणामस्वरूप, पुष्पीय जैव विविधता में वृद्धि होने के कारण वन क्षेत्र में वृद्धि हुई है, जिससे प्राणिजात जैव विविधता में भी वृद्धि हुई है।

3. तकनीकी पहलू: आईएसएफआर 2023 तैयार करने में विभिन्न प्रकार की तकनीकों का प्रयोग किया गया है। सर्वप्रथम, उपग्रह से प्राप्त डेटा की सहायता से देश भर में वनावरण का मानचित्रण किया गया। यह मध्यम-रिजॉल्यूशन वाला स्थानीय उपग्रह डेटा था। यह मानचित्रण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के सेंसर से प्राप्त 23.5 मीटर के स्थानिक रिजॉल्यूशन के साथ किया गया। यह सेंसर स्वदेशी LISS-III था और 1:50,000 के पैमाने पर उपग्रह श्रृंखला में आईआरएस संसाधनों का एक घटक था। विभिन्न राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों के लिए उपग्रह डेटा एक निश्चित अवधि के भीतर प्राप्त किया गया था ताकि उपग्रह आधारित छवि बेहतर गुणवत्ता वाली और मेघ एवं धुंध से मुक्त हो सकें।

4. वनावरण का वर्गीकरण: वृक्ष छत्र घनत्व के आधार पर वनावरण को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है—(i) अत्यंत सघन वन (जिनका छत्र घनत्व 70 प्रतिशत या उससे अधिक है); (ii) मध्यम सघन वन (जिनका छत्र घनत्व 40 प्रतिशत या उससे अधिक किंतु 70 प्रतिशत से कम है); और (iii) खुला वन (जिनका छत्र घनत्व 10 प्रतिशत या उससे अधिक किंतु 40 प्रतिशत से कम है)।

प्राधिकृत संस्थाओं द्वारा दृश्य छवि का विश्लेषण कर और डिजिटल छवि प्रसंस्करण के साथ-साथ जमीनी स्तर पर प्रमाणीकरण, क्षेत्र में एकत्रित डेटा में सुधार, गुणवत्ता जांच और भू सत्यापन कर वन आवरण का आकलन किया गया। परिणामस्वरूप, क्षेत्र की सांख्यिकी और मानचित्रों के अनुरूप निष्कर्ष तैयार किए गए।

5. वर्धमान निधि (स्टॉक): वर्धमान निधि, वन स्वास्थ्य, उत्पादकता और कार्बन भंडार को दर्शाती है, जिससे जैव विविधता संरक्षण और उत्सर्जन गणना में सहायता मिलती है।

भारत की वन इन्वेंट्री (सूची) 1965 में वन संसाधनों के पूर्व-निवेश सर्वेक्षण से शुरू हुई, जो काष्ठ और बांस के आकलन के लिए भारत सरकार, एफएओ और यूनाइटेड नेशन्स डेवलेपमेंट प्रोग्राम की एक संयुक्त पहल थी। 1981 में, यह एक राष्ट्रव्यापी प्रतिदर्श अभिकल्प (डिजाइन) को अपनाते हुए, एफएसआई के रूप में विकसित हुई।

एफएसआई ने 2002 में राष्ट्रीय वन इन्वेंट्री (एनएफआई) शुरू की थी, जिसके तहत देश को 14 भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया था। इसमें प्रति चक्र 60 जिलों में विस्तृत सूची तैयार की गई। 2016 में ग्रिड-आधारित 5 किमी. x 5 किमी. प्रतिदर्श अभिकल्प के साथ पुनरीक्षण समय को 20 वर्ष से घटाकर कर 5 वर्ष कर दिया गया था।

आईएसएफआर तैयार करने के लिए, आंतरिक वनों और बाह्य अभिलिखित वनों की इन्वेंट्री दर्ज की गई थी। एफएसआई के एनएफआई कार्यक्रम के एक भाग के रूप में इन क्षेत्रों से क्षेत्रीय इन्वेंट्री डेटा प्राप्त किया गया था। इस डेटा ने वृद्धिशील वन, वृक्षावरण, कार्बन भंडार, बांस भंडार, कृषि वानिकी और अन्य प्रमुख पहलुओं के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की।

निष्कर्ष

आईएसएफआर 2023 देश के वन और वृक्ष संसाधनों का विवरण रखने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यह राज्य वन विभागों, नीति निर्माताओं, योजनाकारों, अनुसंधान संगठनों, शिक्षाविदों, विकास कार्यों के लिए उत्तरदायी एजेंसियों, नागरिक समाज, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और संरक्षणवादियों के लिए महत्वपूर्ण सूचना स्रोत है।

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