books
ComputerAwareness-26.webp
previous arrow
next arrow
Shadow

ग्लेशियर संरक्षण पर यूएन का प्रथम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 2025

ग्लेशियरों (हिमनदों) के संरक्षण पर पहला उच्च-स्तरीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 29 से 31 मई, 2025 तक ताजिकिस्तान गणराज्य की राजधानी दुशांबे में आयोजित किया गया था। इसके अलावा, सम्मेलन के समापन के बाद 1 जून, 2025 को एक क्षेत्रीय दौरे का आयोजन भी किया गया। सम्मेलन का मुख्य एजेंडा वैश्विक जलवायु की समस्या, अर्थात ग्लेशियरों का पीछे हटना, और विश्व भर में ग्लेशियरों के संरक्षण हेतु संभावित समाधानों पर चर्चा करना था।

इस कार्यक्रम में विश्व के 80 देशों के 2,500 से अधिक गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया। इनमें संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और नागरिक समाज के उच्चाधिकारी, विभिन्न देशों के शासनाध्यक्ष, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के संगठनों के वरिष्ठ प्रतिनिधि, अनुसंधान संस्थानों एवं वित्तीय संस्थानों के प्रमुख, अंतरराष्ट्रीय नीति निर्माता, वैज्ञानिक, विशेषज्ञ और विकास भागीदार शामिल थे।

पृष्ठभूमि

संयुक्त राष्ट्र महासभा के 77वें सत्र के दौरान, संयुक्त राष्ट्र ने एक प्रस्ताव पारित कर वर्ष 2025 को इंटरनेशनल ईयर ऑफ ग्लेशियर प्रेजर्वेशन घोषित किया। इमोमाली रहमान, ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति, ने इस पहल का प्रस्ताव रखा था, इसलिए यह सम्मेलन ताजिकिस्तान में आयोजित किया गया। संयुक्त राष्ट्र के इस प्रस्ताव के तहत, यह सम्मेलन ताजिकिस्तान में एक प्रमुख कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया गया। सम्मेलन को ‘द दुशांबे प्रोसेस फॉर ग्लेशियर प्रेजर्वेशन’ नामक एक नई वैश्विक पहल की शुरुआत के साथ आरंभ किया गया।

संयुक्त राष्ट्र के इसी सत्र के दौरान यह घोषणा भी की गई कि 2025 से प्रतिवर्ष 21 मार्च को विश्व ग्लेशियर दिवस मनाया जाएगा।

सम्मेलन का आयोजन किसने किया

इस सम्मेलन का आयोजन ताजिकिस्तान सरकार द्वारा संयुक्त राष्ट्र, विशेष रूप से विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) और यूनेस्को, एशियन डेवलेपमेंट बैंक (एडीबी) और कुछ अन्य प्रमुख भागीदारों के सहयोग से किया गया था। ताजिकिस्तान सरकार ने प्रधानमंत्री के नेतृत्व में नेशनल ऑर्गेनाइजिंग कमेटी का गठन किया। इस समिति को, सम्मेलन सचिवालय के साथ, सम्मेलन के आयोजन की पूरी जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

सम्मेलन के उद्देश्य

सम्मेलन में विश्व के समग्र पारिस्थितिक तंत्र में ग्लेशियरों की भूमिका पर प्रकाश डाला गया। सम्मेलन में इस बात पर बल दिया गया कि वैश्विक एजेंडा ग्लेशियरों को टूटने और बर्फ को पिघलने, पीछे हटने और तेजी से पिघलने से रोकना है।

सम्मेलन का उद्देश्य विश्व भर में ग्लेशियरों के पिघलने और इसके दूरगामी प्रभावों से निपटने के लिए वैश्विक प्रयासों को संगठित करना था। यह वैज्ञानिक नवाचार, सहयोगात्मक कार्रवाई और नीतिगत संरेखण के माध्यम से किया जाएगा। ग्लेशियर संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक संसाधनों का अधिग्रहण एवं प्रबंधन, और अंतरराष्ट्रीय सहयोग विकसित किया जाएगा। ग्लेशियरों का अनुरक्षण करने और उनके सामाजिक-आर्थिक लाभों का फायदा उठाने के लिए, विभिन्न देशों के बीच सहयोग की आवश्यकता है। इसके लिए, यह सम्मेलन विश्व की विभिन्न सरकारों, नागरिक समाजों, वैज्ञानिकों और अन्य हितधारकों के बीच मजबूत साझेदारी विकसित करने का प्रयास करता है।

यह सम्मेलन कई अन्य वैश्विक बैठकों और आयोजनों में योगदान देगा, जिनमें हाई-लेवल पॉलिटिकल फोरम ऑन सस्टेनेबल डेवलेमेंट (न्यूयॉर्क, जुलाई 2025), यूएनएफसीसीसी सीओपी30 (ब्राजील, नवंबर 2025, अगली प्रतिबद्धता अवधि के लिए पेरिस एग्रीमेंट एनडीसी के नवीनीकरण के लिए एक महत्वपूर्ण सीओपी) और संयुक्त अरब अमीरात तथा सेनेगल द्वारा आयोजित 2026 यूएन वॉटर कॉन्फ्रेंस को आरंभ करने हेतु कई प्रारंभिक बैठकें शामिल हैं। आगामी बहुपक्षीय आयोजनों की सूचना दुशांबे ग्लेशियर हाई-लेवल डेक्लेरेशन के तहत दी जाएगी, जिससे ग्लेशियरों के संरक्षण को वैश्विक सतत विकास के लक्ष्यों में से एक माना जाएगा।

सम्मेलन के कई अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  • वैज्ञानिक अनुसंधान और निगरानी प्रणालियों का निर्माण करना ताकि ग्लेशियर के स्वरूप में बदलावों की उचित व्याख्या की जा सके।
  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण और पूर्व चेतावनी प्रणालियों सहित अनुकूलन की एकीकृत रणनीतियों के उपयोग का समर्थन करना।
  • ग्लेशियर के पीछे खिसकने से होने वाले सामाजिक-आर्थिक प्रभावों से निपटना।
  • ग्लेशियर संरक्षण के लक्ष्यों को ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और जल संरक्षण के वैश्विक लक्ष्यों के साथ समन्वित करना।
  • ग्लेशियरों के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाना, संसाधन प्राप्त करना, और 22 सितंबर, 2024 को ‘सम्मिट ऑफ द फ्यूचर’ में अपनाए गए ‘द पैक्ट फॉर द फ्यूचर’, और सतत विकास हेतु एजेंडा 2030 जैसे अन्य तंत्रों का अधिकतम प्रयोग करना।

कुछ प्रमुख बिंदु

सम्मेलन के कुछ प्रमुख बिंदु निम्न प्रकार से हैं:

ग्लेशियरों के संरक्षण हेतु अतिरिक्त जलवायु कार्रवाईः वैश्विक ग्लेशियरों को केवल सीओपी30 में तापमान के 1.5° सेल्सियस के स्तर में सुधार करके ही संरक्षित किया जा सकता है। ध्यातव्य है कि 1.5° सेल्सियस पर उच्च पर्वतीय एशिया और ताजिकिस्तान में स्थित कई ग्लेशियर भी लुप्त हो जाएंगे। हालांकि, वर्तमान परिदृश्य 2.5° सेल्सियस तक का एक अवसर देगा, जो ग्लेशियरों और उनसे संबद्ध उन समुदायों को नष्ट कर देगा जो अपनी दैनिक जल की आवश्यकता की पूर्ति इन ग्लेशियरों से करते हैं।

वैज्ञानिक अनुसंधान और निगरानी में प्रगतिः यह सम्मेलन तकनीकी नवाचारों, स्वदेशी ज्ञान और निगरानी प्रणालियों के माध्यम से उच्च पर्वतीय निम्नतापमंडल (क्रायोस्फीयर) विज्ञान में सुधार को प्रोत्साहित करेगा। इससे वैज्ञानिकों को ग्लेशियरों के पीछे खिसकने के पैटर्न के बारे में जानने और यह समझने में मदद मिलेगी कि यह जल संसाधनों, पारिस्थितिक तंत्रों और विश्व की जलवायु प्रणाली को कैसे प्रभावित करेगा।

पीछे खिसकते ग्लेशियरों से संबद्ध सामाजिक-आर्थिक प्रभावों से निपटनाः यह सम्मेलन पीछे खिसकते ग्लेशियरों के विभिन्न सामाजिक-आर्थिक परिणामों का विश्लेषण करेगा। इनमें खाद्य सुरक्षा, जल उपलब्धता, आजीविका, जलविद्युत, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत पर ग्लेशियरों के पीछे खिसकने के प्रभाव शामिल हैं। इन प्रभावों को कम करने और ग्लेशियरों पर आश्रित समुदायों को अधिक लचीला बनाने के लिए व्यावहारिक समाधानों की आवश्यकता है।

ग्लेशियर संरक्षण और संसाधनों के प्रबंधन के प्रति लोगों को अधिक जागरूक बनानाः इस सम्मेलन का उद्देश्य विश्व भर के लोगों में इस बारे में जागरूकता बढ़ाना है कि पारिस्थितिक संतुलन और सामाजिक-आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए ग्लेशियर कितने महत्वपूर्ण हैं। यह सम्मेलन विश्व भर में ग्लेशियरों के संरक्षण और प्रभावी जलवायु समाधानों को लागू करने की पहल को सुगम बनाने के लिए वित्तीय और तकनीकी संसाधन जुटाने हेतु भी कार्य करेगा।

दुशांबे घोषणापत्र के कुछ मुख्य अंश

25 सितंबर, 2015 के यूनाइटेड नेशन्स जनरल असेंबली रिजोल्यूशन 70/1, ‘‘ट्रांसफॉर्मिंग आवर वर्ल्डः द 2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलेपमेंट’’ नामक प्रस्ताव के प्रति नेताओं ने अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, जिसमें इसने सार्वभौमिक एवं परिवर्तनकारी सतत विकास लक्ष्यों और उद्देश्यों, जिनमें समर्पित जलवायु कार्रवाई (लक्ष्य 13) भी शामिल है, का एक व्यापक, दूरगामी तथा जन-केंद्रित समुच्चय अपनाने के साथ-साथ राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप 22 सितंबर, 2024 के यूनाइटेड नेशन्स जनरल असेंबली रिजोल्यूशन 79/1 ‘‘द पैक्ट फॉर द फ्यूचर’’ के प्रासंगिक प्रावधान शामिल हैं।

सम्मेलन में शामिल सभी पक्षों ने 30 नवंबर से 12 दिसंबर, 2023 तक दुबई, संयुक्त अरब अमीरात में आयोजित कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज के 28वें सत्र के प्रथम ग्लोबल स्टॉकटेक के परिणाम सहित यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज और पेरिस समझौते पर बल दिया।

सभी पक्षों ने 14 दिसंबर, 2022 के यूनाइटेड नेशन्स जनरल असेंबली रिजोल्यूशन 77/172 को दोहराया, जिसमें 2023-27 की अवधि को पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के लिए पांच वर्ष की कार्रवाई के रूप में घोषित किया गया था।

सभी पक्षों ने माना कि ग्लेशियर और व्यापक निम्नतापमंडल जल विज्ञान चक्र के महत्वपूर्ण घटक हैं और वर्तमान में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के तेजी से पीछे खिसकने, बर्फ की चादरों के पिघलने, हिमपुंज (स्नोपैक—किसी स्थान पर बर्फ का कई परतों में संचित भंडार) के नष्ट होने और स्थायी तुषार भूमि (पर्माफ्रॉस्ट) के पिघलने की घटनाएं हो रही हैं, जिनके पर्यावरण, मानव कल्याण, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, बुनियादी अवसंरचना, पर्यटन, कृषि, पारिस्थितिक तंत्र और संधारणीय विकास पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहे हैं।

सम्मेलन में शामिल सभी पक्षों ने इस बात पर बल दिया कि ग्लेशियर और बर्फ के पिघलने से ग्लेशियरों के निकट और सुदूरवर्ती समुदायों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है, जिससे अलवणजल के संसाधनों, जिन पर अरबों लोग पेयजल आपूर्ति, सिंचाई, आजीविका और ऊर्जा उत्पादन आदि के लिए निर्भर हैं, की उपलब्धता बाधित होती है।

सभी पक्षों ने इस बात पर भी बल दिया कि कई ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में, वैश्विक तापन में वृद्धि के कारण ग्लेशियरों के पीछे खिसकने और स्थायी तुषार भूमि के पिघलने से ढालों की स्थिरता और कम होने का अनुमान है, तथा ग्लेशियल झीलों के प्रस्फोट या बर्फ पर वर्षा की घटनाओं, भूस्खलन और हिमस्खलन के कारण बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि होने का अनुमान है। सभी पक्षों ने आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क 2015-30 और मई 2023 में इसकी मध्यावधि समीक्षा के परिणामों पर ध्यान दिया, जिसमें सभी स्तरों पर नीतियों, कार्यक्रमों और निवेशों में आपदा जोखिम न्यूनीकरण को एकीकृत करने की प्रगति में तेजी लाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है।

सभी पक्षों ने ग्लेशियरों के संरक्षण एवं पारिस्थितिक तंत्रों की सुरक्षा, संरक्षण, पुनर्स्थापन और सतत प्रबंधन के बीच अंतर्संबंधों की आवश्यकताओं के साथ ही जलवायु कार्रवाई, जैव विविधता संरक्षण, आपदा जोखिम न्यूनीकरण और मरुस्थलीकरण से निपटने के साथ-साथ मानव विकास के साथ उनके संबंधों पर भी विचार किया।

सभी पक्षों ने 21 मार्च, 2025 को ‘वर्ल्ड ग्लेशियर डे’ की प्रथम वार्षिक आयोजना के रूप में मनाना स्वीकार किया और यूनाइटेड नेशन्स वर्ल्ड वॉटर डे रिपोर्ट, वॉटर टावर्सः माउंटेन्स एंड ग्लेशियर के 2025 के संस्करण पर ध्यान केंद्रित किया।

सभी पक्षों ने पिघलते ग्लेशियरों और निम्नतापमंडल में परिवर्तन से संबद्ध चुनौतियों का समाधान करने के लिए संबंधित वैज्ञानिक अनुसंधान को आगे बढ़ाने और निरंतर निगरानी के महत्व पर प्रकाश डाला, जिसकी मांग 13 अगस्त, 2024 के यूनाइटेड नेशन्स जनरल असेंबली रिजोल्यूशन 78/321 में की गई थी।

उन्होंने 2030 एजेंडा और इसके सतत विकास लक्ष्यों, डेकेड ऑफ एक्शन ऑन p 2025-34, और इंटरनेशनल डेकेड ऑफ एक्शन, “वॉटर फॉर सस्टेनेबल डेवलेपमेंट” 2018-28 के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए पृथ्वी के निम्नतापमंडल से संबंधित पहलों के महत्व पर जोर दिया।

भविष्योन्मुखी महत्वपूर्ण संदेश

सम्मेलन में भाग लेने वाले नेताओं ने सभी निर्णयकर्ताओं और हितधारकों को निम्नलिखित कार्य करने के लिए आमंत्रित और प्रोत्साहित कियाः

  • ग्लेशियरों, हिमपुंजों और हिमनदोत्तर पारिस्थितिकी प्रणालियों के संरक्षण के लिए जागरूकता बढ़ाने और इससे संबंधित कार्रवाई को सुगम बनाने की तत्काल आवश्यकता पर बल देना।
  • जल संसाधनों का स्थायी प्रबंधन करने, और तेजी से घटते निम्नतापमंडल से उत्पन्न जोखिमों को कम करने के लिए जलवायु शमन, अनुकूलन और लचीलेपन के लिए एकीकृत दृष्टिकोण को बढ़ावा देना।
  • अनुकूलन के लिए प्रभावी उपाय सुनिश्चित करना और भविष्य की हानि तथा टूट-फूट से बचना।
  • विभिन्न स्तरों पर पर्वतीय निम्नतापमंडल निगरानी और अनुसंधान पर वैज्ञानिक संस्थानों एवं संबंधित हितधारकों के बीच सहयोग तथा साझेदारी को बढ़ावा देना।
  • ग्लेशियर संबंधी अनुकूलन के लिए वित्तीय कमी को एक अत्यावश्यक आवश्यकता के रूप में पहचानना।
  • ग्लेशियर संबंधी प्रक्रियाओं में महिलाओं, युवाओं, स्थानीय समुदायों और स्वदेशी लोगों सहित सभी हितधारकों की भागीदारी को बढ़ावा देना।

निष्कर्ष

ग्लेशियर, अलवणजल के भंडार होने के अलावा, पृथ्वी पर जलवायु को नियंत्रित करते हैं, जो जैव विविधता की उत्तरजीविता के लिए जिम्मेदार है और इन क्षेत्रों को लचीला बनाता है। इनका सांस्कृतिक, पारिस्थितिक और भू-राजनीतिक महत्व है, इसलिए इन्हें साझा प्राकृतिक विरासत माना जाना चाहिए, न कि केवल संसाधनों के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए। बेहतर निगरानी प्रणालियों, ग्लेशियर संरक्षण को राष्ट्रीय कानूनों के अंतर्गत शामिल करने और वैश्विक शासन प्रणाली के माध्यम से ग्लेशियरों का संरक्षण किया जा सकता है।

© Spectrum Books Pvt. Ltd.

 

spectrum-books-logo

  

Spectrum Books Pvt. Ltd.
Janak Puri,
New Delhi-110058

  

Ph. : 91-11-25623501
Mob : 9958327924
Email : info@spectrumbooks.in