स्तूप: ‘स्तूप’ का शाब्दिक अर्थ होता है—टीला। स्तूप एक विशाल अर्धगोलाकार गुंबद जैसी संरचना थी जिसके केंद्रीय कक्ष में लघु मंजूषा के भीतर बुद्ध अथवा बौद्ध भिक्षुओं के पवित्र पुरावशेष सुरक्षित रखे जाते थे। इसके आधार पर एक दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा पथ बना होता था, जो प्रारंभ में लकड़ी की और कालांतर में पाषाण की वेदिकाओं से निर्मित होने लगा। स्तूप के प्रमुख उदाहरणों में मध्य प्रदेश के भरहुत एवं सांची के स्तूप (मूलतः मौर्यकालीन किंतु मौर्योत्तर काल में विस्तारित) तथा आंध्र प्रदेश के अमरावती एवं नागार्जुनकोंडा के स्तूप विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
चैत्य: बौद्ध या जैन धर्म में ‘चैत्य’ शब्द का प्रयोग प्रार्थना कक्ष, जो प्रायः आयताकार होता है और स्तूप की ओर से जाने वाले मार्ग के स्तंभों की दो पंक्तियों द्वारा अलग होता है, के लिए किया जाता है। प्रारंभिक चैत्य लकड़ी से बने होते थे। बाद में शैलकृत चैत्यों और विहारों का निर्माण किया जाने लगा। इससे पूर्ववर्ती चैत्यों को गजपृष्ठाकार (apsodal—एक अर्ध-गुंबद से आवृत एक अर्धवृत्ताकार गुहा) ढांचे के रूप में बनाया जाता था, तथा आमतौर पर ये शैलकृत, या मुक्त रूप से खड़े होने वाले पत्थरों अथवा ईंटों से निर्मित होते थे।
विहार: विहार, भ्रमण करने वाले बौद्ध भिक्षुओं के निवास स्थान होते हैं, जिन्हें आरंभ में वर्षा ऋतु में आश्रय के लिए बनाया गया था। विहार का अर्थ होता है—निवास-स्थान। प्रारंभिक विहार शीघ्र ही मामूली फूस की झोपड़ियों से शैलकृत आवासों के रूप में और फिर संघाराम या बड़े मठों के रूप में विकसित हुए। समय के साथ, इनमें से कुछ संघाराम शैक्षणिक संस्थानों और बौद्ध शिक्षा के केंद्रों के रूप में विकसित हुए, जैसे कि नालंदा, विक्रमशिला और सोमपुरा। इनमें से कई विहारों में पत्थर की दीवारों को तराशकर चबूतरे बनाए गए थे, जिनका प्रयोग शय्या तथा अध्ययन एवं चिंतन-मनन करने के स्थानों के रूप में किया जाता था।
उल्लेखनीय है कि मौर्योत्तर काल में सातवाहन शासकों के संरक्षण में महाराष्ट्र के पुणे एवं नासिक के समीप ठोस चट्टानों को तराशकर बड़ी संख्या में चैत्यगृह तथा विहार बनाए गए। इन चैत्यों के गर्भगृह में सामान्यतः एक प्रार्थना स्तूप स्थापित होता था।



