स्मारक पत्थर, प्राचीन स्मारक हैं जिन पर मृतकों की याद में लेख उत्कीर्ण होते हैं। इन स्मारकों को वीर शिलाओं, सती शिलाओं, और धार्मिक/आध्यात्मिक वचनों हेतु निर्मित स्मारकों के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- वीर शिलाओं का उद्भव महापाषाणकालीन शवाधान परंपराओं तथा उन योद्धाओं की स्मृति में रखे जाने वाली शिलाओं से हुआ है जो वीरतापूर्वक, विशेषकर किसी युद्ध या मवेशी चोरों पर धावा बोलने के संघर्ष में, मृत्यु को प्राप्त होते थे। संगम साहित्य तथा तोल्कापिय्यम् जैसे ग्रंथों में इन स्मारकों, प्रायः वीरों के नामों एवं उनके कृत्यों के वर्णन सहित, का निर्माण तथा उपासना का वर्णन किया गया है। समय के साथ, वीर शिलाओं में सामाजिक संरचनाओं में परिवर्तन, मध्यकालीन श्रेणीबद्ध राज्यों में निकट आत्मीय संबंधों से हटकर के शासक प्रति निष्ठा के रूप में, दिखाई देने लगा। मवेशियों के लिए संघर्ष, ग्राम सुरक्षा, अपने स्वामी के नेतृत्व में युद्ध, और स्त्रियों की सुरक्षा करने जैसी वीरतापूर्ण घटनाओं पर शिलालेख उत्कीर्णित करवाए जाते थे। ये पत्थर पराक्रम, निष्ठा और पूर्व मध्यकालीन दक्षिण भारत में, विशेष रूप से चोल काल में, सैन्य/लड़ाकू प्रवृत्ति या व्यवहार का उत्सव मनाने वाले पवित्र स्थलों के रूप में स्थापित किए जाते थे।
- सती शिलाएं उन विधवा महिलाओं को समर्पित हैं जो अपने पति की चिता में अपना जीवन बलिदान कर देती थीं। ये शिलाएं उन महिलाओं को वीरता तथा सम्मान के आदर्श से जोड़ती हैं। मध्यकाल में पंपा तथा रन्ना द्वारा रचित रचनाओं में सती को पवित्र आचरण के रूप में वर्णित किया गया है। शिलालेखों में अभिजात वर्ग की महिलाओं, अधिकांशतः गौड़ वंश की, द्वारा पारिवारिक प्रतिष्ठा, योद्धाओं/वीरों के आदर्शों, तथा सामाजिक प्रतिष्ठा को बरकरार रखने के लिए अपने बलिदान का निर्णय लिए जाने का वर्णन अंकित है।
- जैन निशिधि शिलाएं या स्मारक संन्यासी/भिक्षुओं, भिक्षुणियों, और उन गृहस्थ अनुयायियों को समर्पित होते थे जिन्होंने सल्लेखना या संन्यास, एक धार्मिक प्रतिज्ञा—जिसमें आध्यात्मिक अनुशासन के एक कृत्य के रूप में मृत्युपर्यंत क्रमिक उपवास रखा जाता था—का पालन करते हुए मृत्यु का वरण किया हो।



