सिकंदर (अलेक्जेंडर) ने 336 ईसा पूर्व में मैसेडोनिया के सैन्य साम्राज्य की बागडोर संभाली। शीघ्र ही उसने एशिया माइनर, इराक, सीरिया, बेबीलोन और मिस्र को जीत लिया। तत्पश्चात, 330 से 331 ईसा पूर्व में उसने अराबेला या आरबेला के युद्ध में हखमनी (Achaemenid) वंश के अंतिम शासक डेरियस तृतीय को पराजित कर फारस साम्राज्य पर अपना आधिपत्य स्थापित कर किया। अपनी इस विजय से उत्साहित होकर सिकंदर ने 327 ईसा पूर्व में हिंदूकुश पर्वतमाला को पार कर भारतीय उपमहाद्वीप की ओर प्रस्थान किया। सिंधु नदी को पार करने से पूर्व, उसने विभिन्न स्थानीय जनजातियों के प्रतिरोध का दमन किया और स्वात एवं काबुल नदियों के संगम पर स्थित रणनीतिक नगर पुष्कलावती पर अधिकार कर लिया। पश्चिमोत्तर भारत में प्रवेश के समय, तक्षशिला के राजा आम्भीक ने स्वेच्छा से सिकंदर की अधीनता स्वीकार कर ली, किंतु उसे पौरव नरेश (पुरु या पोरस) के भीषण विरोध का सामना करना पड़ा। झेलम के युद्ध में पोरस की पराजय के उपरांत सिकंदर ने उसकी वीरता से प्रभावित होकर उसका राज्य पुनः उसे सौंप दिया। इसके पश्चात, पौरव राज्य के समीपवर्ती जनजातीय क्षेत्रों पर विजय प्राप्त करते हुए सिकंदर ने चेनाब और रावी नदियों को पार किया तथा कठ जनजाति के सुदृढ़ दुर्ग सांगला पर अधिकार कर लिया। जब यूनानी सेना ब्यास नदी के तट पर पहुंची, तो निरंतर युद्धों से थके हुए सैनिकों ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। विवश होकर सिकंदर को वापस लौटना पड़ा, और स्थल मार्ग से स्वदेश लौटने के दौरान 323 ईसा पूर्व में बेबीलोन के सूसा में ही उसकी मृत्यु हो गई।
सिकंदर के आक्रमण के प्रभाव
यद्यपि सिकंदर ने अपने विश्व विजय का स्वप्न पूरा करने तथा भारत की अपार संपदा प्राप्त करने के उद्देश्य से भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश किया था, तथापि भारत में वह लगभग दो वर्षों की अल्पावधि तक ही रह सका। इसके बावजूद, उसके आक्रमण, ने भारत की राजनीति, समाज तथा संस्कृति पर अपने महत्वपूर्ण प्रभाव छोड़े।
राजनीतिक प्रभावः सिकंदर के आक्रमण ने पश्चिमोत्तर भारत के राज्यों की दुर्बलता को उजागर कर दिया, जिसके फलस्वरूप सिकंदर के लौटने के पश्चात चंद्रगुप्त मौर्य इन राज्यों को जीतने में सफल रहा और शीघ्र ही उसने विशाल मौर्य साम्राज्य की स्थापना कर ली या अन्य शब्दों में उत्तरी भारत को एकीकृत करने में सफलता प्राप्त की।
इसके अलावा, सिकंदर की अनुशासित सेना तथा युद्ध की उन्नत तकनीकों ने भारतीय शासकों को अपनी सेना तथा युद्ध कौशल में सुधार करने के लिए प्रेरित किया। कुछ विद्वानों द्वारा माना जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य, सिकंदर के सैन्य तंत्र की कार्यप्रणाली का अनुसरण कर ही नंद वंश के शासन को समाप्त करने में सफल हुआ। भारत में प्रांतीय शासन की नींव रखने का श्रेय भी सिकंदर को दिया जाता है, जैसा कि उसने अपने जीते हुए प्रदेशों को क्षत्रपियों में विभाजित कर वहां अपने क्षत्रपों को नियुक्त किया, जिसका प्रभाव परवर्ती काल में मौर्यकालीन प्रशासन में देखा गया।
आर्थिक प्रभावः पश्चिमोत्तर भारत पर सिकंदर के सैन्य अभियानों ने प्राचीन यूरोप और भारत के मध्य अंतःक्रिया को एक नवीन आयाम प्रदान किया, जिसके परिणामस्वरूप चार प्रमुख थल एवं जल मार्गों का मार्ग प्रशस्त हुआ और व्यापारिक अवसंरचना सुदृढ़ हुई। सिकंदर द्वारा नयार्कस (Nearchus) के नेतृत्व में भेजे गए नौसैनिक बेड़े ने सिंधु के मुहाने से फरात (Euphrates) नदी तक तटीय अन्वेषण और बंदरगाहों की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यूनानी संपर्क के परिणामस्वरूप, भारत में मुद्रा निर्माण कला का विकास हुआ और यूनानी शैली की भांति भारत में भी उलूक शैली के सिक्के ढालने की परंपरा शुरू हुई।
सिकंदर के सैन्य अभियानों और विजयों का एक महत्वपूर्ण परिणाम भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर भारत के सीमांत क्षेत्रों में कई यूनानी सैन्य बस्तियों की स्थापना था। इन नवीन नगरों ने उन पूर्व-स्थापित क्षेत्रों का विस्तार किया जहां यूनानी आबादी पहले से मौजूद थी। प्रमुख यूनानी उपनिवेशों में अलेक्जेंड्रिया (आधुनिक काबुल क्षेत्र के समीप), बुकेफाल (झेलम नदी के तट पर), और दक्षिणी क्षेत्रों में स्थापित अलेक्जेंड्रिया जैसे नगर शामिल थे। ये बस्तियां कालांतर में भारत-यूनानी सांस्कृतिक और व्यापारिक संपर्क के महत्वपूर्ण केंद्रों के रूप में विकसित हुईं।
सांस्कृतिक प्रभावः भारत और यूनान के बीच संपर्क के कारण मूर्ति निर्माण की एक नवीन शैली का विकास हुआ। इसे गांधार शैली के नाम से जाना जाता है। चिकित्सा, दर्शन एवं साहित्य पर भी यूनानी संपर्क का प्रभाव पड़ा। अनेक यूनानी दार्शनिक भारतीय दार्शनिकों के संपर्क में आए और एक-दूसरे के दर्शन से प्रभावित हुए। यूनानी दार्शनिक पाइथागोरस पर भारतीय दर्शन का प्रभाव था। भारतीय नाटकों में यवनिका (अर्थात पर्दा) शब्द का उल्लेख मिलता है, जो यूनानी संपर्क के कारण ही भारतीय नाटकों में प्रचलित हुआ।
ऐतिहासिक प्रभावः सिकंदर के साथ, और उसके बाद भी अनेक यूनानी लेखक, इतिहासकार और राजदूत—जैसे कि मेगस्थनीज—भारत आए। उनके द्वारा तिथि सहित सिकंदर के अभियानों का विवरण लिखे जाने के साथ ही तत्कालीन भारत की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों का वर्णन किया गया। इन विवरणों ने न केवल इतिहासकारों को भारत की तत्कालीन परिस्थितियों से परिचित कराया, अपितु भारतीय इतिहास का तिथिक्रम निर्धारित करने में भी सहायता की।



