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नागर, द्रविड़ और वेसर भारत में मंदिर निर्माण की तीन प्रमुख स्थापत्य शैलियां हैं।

  • नागर शैली, उत्तर भारत की प्रमुख शैली, की पहचान मंदिर के गर्भगृह के ऊपर उठी हुई वक्राकार मीनार (शिखर) से की जा सकती है। इस शैली के प्रारंभिक मंदिरों में पिरामिडनुमा शिखरों तथा गवाक्ष रूपांकनों से सज्जित गुजरात के मैत्रक मंदिर शामिल हैं। यह शैली चंदेल वंश के शासनकाल में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई जो खजुराहो के मंदिरों में दृश्यमान है, जहां बहुस्तरीय/बहुसतही बाह्य दीवारों पर ऊंची संरचनाएं तथा खूबसूरती से तराशी गईं मूर्तियां दिखाई देती हैं। स्थापत्य की नागर शैली में कई क्षेत्रीय रूप उभरे, जिनमें मुख्यतः ओडिशा की कलिंग शैली में निर्मित लिंगराज मंदिर तथा कोणार्क के सूर्य मंदिर जैसे स्मारकों के साथ-साथ महाराष्ट्र के अंबरनाथ मंदिर में देखी जाने वाली भूमिजा शैली उल्लेखनीय हैं।
  • दक्षिण भारत की द्रविड़ शैली को सीढ़ीदार पिरामिडनुमा मीनारों (विमानों) तथा संलग्न मंदिर परिसरों से चिह्नित किया जाता है। इस शैली को पल्लव शासकों द्वारा महाबलिपुरम् में स्थित तट मंदिर, एक ऐतिहासिक स्थल, के साथ शुरू किया गया था। परवर्ती काल में चोल शासकों ने ऐतिहासिक रूप से तंजावुर में दृष्टांतस्वरूप बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण कर इस शैली को व्यापकता प्रदान की।
  • दक्कन में विकसित वेसर शैली, नागर और द्रविड़ शैलियों की विशेषताओं का मिश्रित रूप है। चालुक्यों द्वारा प्रवर्तित तथा होयसलों द्वारा परिष्कृत, वेसर शैली में निर्मित मंदिर अपने संरचनात्मक प्रयोग, जटिल मूर्तियों, और ऊंची वेदिकाओं, जैसा कि पट्टदकल, बेलूर तथा हेलेबिडु में देखा जाता है, के लिए प्रसिद्ध हैं।

कुल मिलाकर, ये सभी शैलियां सभी क्षेत्रों तथा शताब्दियों में भारत के मंदिर निर्माताओं की विविधता, रचनात्मकता, और असाधारण कौशल को प्रकट करती हैं।

 

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