हर्षवर्धन, (शासनकाल लगभग 606–647 ईसवी) गुप्त साम्राज्य (छठी शताब्दी ईसवी) के पतन के बाद उत्तर भारत का सबसे प्रभावशाली शासक था। वह थानेसर (आधुनिक हरियाणा) के पुष्यभूति वंश से संबंधित था, लेकिन बाद में उसकी राजधानी कान्यकुब्ज (कन्नौज) में स्थानांतरित हो गई।
हर्ष के शासनकाल में भारत में एक बहुधर्मी परिवेश था। इस दौरान ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म (शैव, वैष्णव), बौद्ध धर्म के विभिन्न संप्रदाय (विशेषकर महायान) और जैन धर्म जैसी प्रमुख परंपराएं सह-अस्तित्व में थीं, जिनमें कभी सहयोग तो कभी प्रतिस्पर्धा दिखाई देती थी। व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता और वैधता प्राप्त करने हेतु शासक सामान्यतः एक से अधिक धर्मों को राजकीय संरक्षण प्रदान करते थे।
हर्षवर्धन के धार्मिक जीवन का प्रारंभिक चरण शिव के प्रति उसकी अगाध श्रद्धा से चिह्नित होता है, जिसकी पुष्टि अभिलेखीय साक्ष्यों में प्रयुक्त परममाहेश्वर जैसी उपाधियों से होती है। कालांतर में, बौद्ध भिक्षु जयसेन तथा दिवाकर मित्र एवं चीनी यात्री ह्वेनसांग से प्रभावित होकर वह बौद्ध धर्म (महायान शाखा) का अनुयायी बन गया। यह वैचारिक परिवर्तन किसी संकीर्ण सांप्रदायिकता का परिचायक न होकर एक समन्वयवादी एवं सहिष्णु धार्मिक दृष्टिकोण का सूचक था, जिसमें व्यक्तिगत मत के स्थान पर राजकीय संरक्षण और धार्मिक सद्भाव को वरीयता दी गई। हर्ष का शासनकाल धार्मिक बहुलवाद की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उसने हिंदू ब्राह्मणवादी परंपराओं (ऋग्वेदी और सामवेदी शाखाओं के ब्राह्मणों को भूमि दान) और बौद्ध संस्थानों, दोनों को निरंतर राजकीय संरक्षण प्रदान किया। विशेष रूप से चीनी तीर्थयात्री ह्वेनसांग के विवरणों के अनुसार, उसने विशाल धार्मिक सम्मेलनों में विभिन्न मतों के विद्वानों को सम्मानित किया, जो विभिन्न संप्रदायों के प्रति उसके समावेशी समर्थन को दर्शाता है।
हर्ष ने महायान बौद्ध मत के सिद्धांतों पर चर्चा करने हेतु लगभग 643 ईसवी में कन्नौज में धार्मिक सभा का आयोजन किया। इसमें 20 राजाओं सहित हजारों बौद्ध भिक्षुओं, ब्राह्मणों, और जैन विद्वानों ने भाग लिया। इस धार्मिक सभा की अध्यक्षता ह्वेनसांग द्वारा की गई थी। यद्यपि इस धार्मिक सभा के दौरान सांप्रदायिक अंतर्विरोध उजागर हुए, तथापि इसने कन्नौज को एक बौद्धिक एवं आध्यात्मिक केंद्र के रूप में स्थापित करने की हर्ष की महत्वाकांक्षा को प्रदर्शित किया। इसके अतिरिक्त, प्रयाग में प्रत्येक पांच वर्ष पर आयोजित होने वाली महामोक्ष परिषद उसकी धार्मिक सहिष्णुता का चरमोत्कर्ष थी, जहां वह सभी धर्मों के भिक्षुओं एवं निर्धनों को व्यापक स्तर पर सार्वजनिक रूप से दान देता था। इन आयोजनों ने हर्षवर्धन की छवि को एक उदार परोपकारी एवं धर्मरक्षक सम्राट के रूप में भारतीय इतिहास में चिरस्थायी बना दिया।



