मध्यकालीन भारत की आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था का केंद्र ग्रामीण समाज था। जहां कृषि उत्पादन का प्राथमिक साधन थी, वहीं ग्राम, सामाजिक संगठन, राजस्व प्रशासन और सांस्कृतिक विनिमय की आधारभूत इकाई थे। तत्कालीन ग्रामीण संरचना अत्यधिक जटिल एवं वर्गीकृत थी, जिसका निर्धारण भूमि-संबंधों, राजकीय नीतियों, रूढ़िगत अधिकारों तथा जातिगत व्यवसायों के आधार पर होता था। इस व्यवस्था के अंतर्गत छोटे सामंतों, ग्रामीण अधिकारियों, कृषकों एवं गैर-कृषक समूहों (शिल्पकारों) के मध्य एक 'पारस्परिक निर्भरता' का संबंध था, जहां प्रत्येक वर्ग की अपनी विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक भूमिका थी।
छोटे सामंतों की भूमिका केंद्रीय सत्ता और ग्रामीण समाज के बीच एक मध्यवर्ती स्थिति के रूप में थी। विभिन्न क्षेत्रों और कालखंडों में उन्हें सामंत, राणा, राय, जमींदार, नायक या भुइयां जैसे नामों से जाना जाता था। स्थानीय स्तर पर ये शासकों की भूमिका में होते थे, जिनका कार्य भूमि पर नियंत्रण, सशस्त्र अनुचरों का संचालन करना था और इनका एक या अधिक ग्रामों पर प्रभावी अधिकार था। उनकी सत्ता सामान्यतः वंशानुगत होती थी और यह किसी औपचारिक प्रशासनिक नियुक्ति पर नहीं, बल्कि भूमि तथा ग्रामीण जनसमूह पर उनके प्रत्यक्ष नियंत्रण पर आधारित थी। पूर्व मध्यकालीन भारत में छोटे सामंत प्रारंभ में राजाओं के सैन्य अधीनस्थों के रूप में कार्य करते थे, परंतु समय के साथ, विशेष रूप से जब केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई, तो इनमें से अनेक सामंत अर्ध-स्वायत्त शासकों के रूप में स्थापित हो गए।
दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य के अधीन इन छोटे सामंतों को जमींदारों अथवा स्थानीय सरदारों के रूप में शाही प्रशासनिक व्यवस्था में सम्मिलित कर लिया गया। उन्हें मुख्यतः राजस्व संग्रह तथा अपने क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई। यद्यपि वे भूमि के पूर्ण ‘स्वामी’ नहीं थे, तथापि वे भूमि पर अधिकतम अधिकारों का उपभोग करते थे, कृषि उपज का एक निश्चित हिस्सा प्राप्त करते थे और ग्रामीण समाज में अपना सामाजिक प्रभुत्व बनाए रखते थे। उनकी शक्ति जातिगत स्थिति, आनुष्ठानिक विशेषाधिकारों तथा ग्रामीण संस्थाओं पर नियंत्रण के माध्यम से और अधिक सुदृढ़ होती थी।
मध्यकालीन ग्रामीण समाज के एक अपरिहार्य घटक के रूप में ग्राम अधिकारी राज्य और कृषक समुदाय के बीच प्रभावी मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण पद ग्राम प्रधान का था, जिसे मुकद्दम, चौधरी या पटेल जैसे क्षेत्रीय नामों से जाना जाता था। इनका मुख्य उत्तरदायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना, राजस्व निर्धारण एवं संग्रहण में सहायता करना तथा उच्च प्रशासन के समक्ष ग्रामीण हितों का प्रतिनिधित्व करना था। यह पद प्रायः वंशानुगत होता था, जिसके बदले उन्हें राजस्व-मुक्त भूमि (इनाम) के रूप में पारिश्रमिक प्राप्त होता था। इसी प्रकार, पटवारी, कारकून या लेखपाल जैसे अधिकारी भूमि अभिलेखों और राजस्व बहियों के रखरखाव हेतु उत्तरदायी थे। इन अधिकारियों को प्राप्त विशेषाधिकारों और उपज में हिस्सेदारी ने ग्रामीण पदानुक्रम में उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया। सामूहिक रूप से, इन अधिकारियों ने राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद प्रशासनिक निरंतरता सुनिश्चित की, जिससे ग्राम एक स्थिर सामाजिक-आर्थिक इकाई के रूप में अक्षुण्ण बने रहे।
मध्यकालीन भारतीय ग्रामीण समाज में कृषक वर्ग सबसे बड़ा और कृषि उत्पादन से सीधा संबंध रखने वाला समूह था। आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक स्थिति और भूमि-जोत के आधार पर इस वर्ग में अत्यधिक विषमता व्याप्त थी। इस पदानुक्रम में, बड़े किसान या स्वतंत्र भू-स्वामी विशाल भूखंडों पर खेती करवाने के लिए श्रमिकों को नियोजित करते थे, जबकि छोटे किसान और बटाईदार सीमांत जोतों पर निर्भर थे। यद्यपि कृषकों के पास भूमि पर वंशानुगत अधिकार थे, तथापि अंतिम स्वामित्व अधिकार शासक का होता था। मुगल काल में, राजस्व अभिलेखों ने किसानों को खुद-काश्त (स्थायी निवासी कृषक) और पाहि-काश्त (प्रवासी कृषक) के रूप में वर्गीकृत किया। मुजारियन या रैयत वे थे जिनके पास भूमि या औजारों का अभाव था और वे खुद-काश्त पर निर्भर थे। कृषकों को भारी राजस्व मांगों (नकद या वस्तु रूप में) का सामना करना पड़ता था, जिससे प्रायः ऋणग्रस्तता की स्थिति उत्पन्न होती थी। इन चुनौतियों के बावजूद, उन्हें अधिभोग, उत्तराधिकार और साझा संसाधनों तक पहुंच जैसे रूढ़िगत अधिकार प्राप्त थे। राज्य और जमींदारों के साथ उनके संबंध सहयोगपूर्ण होने के साथ-साथ संघर्षपूर्ण भी थे, विशेषकर कृषि संकट या उच्च कराधान के दौरान।
मध्यकालीन ग्रामीण समाज में गैर-कृषक वर्ग एक अनिवार्य किंतु अधीनस्थ घटक के रूप में विद्यमान थे, जिनमें शिल्पकार, सेवा प्रदाता और कृषि श्रमिक शामिल थे। ग्रामीण शिल्पकार, जैसे—लोहकार, काष्ठकार, कुम्हार, बुनकर और चर्मकार आदि, कृषि उपकरणों एवं घरेलू वस्तुओं की आपूर्ति कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करते थे। इनमें से अधिकांश वर्ग 'जजमानी प्रथा' जैसी पारंपरिक व्यवस्थाओं के माध्यम से कृषक समुदाय से जुड़े थे, जिसके तहत उन्हें अपनी सेवाओं के बदले अनाज या उपज का एक निश्चित हिस्सा प्राप्त होता था। यद्यपि इस पारस्परिक विनिमय प्रणाली ने उन्हें न्यूनतम निर्वाह की सुरक्षा प्रदान की, तथापि इसने उनकी आर्थिक गतिशीलता को काफी हद तक सीमित कर दिया। हालांकि, बुनकर जैसे कुछ विशिष्ट शिल्पकार स्थानीय एवं क्षेत्रीय बाजारों के लिए भी उत्पादन करते थे, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था व्यापक वाणिज्यिक तंत्रों से संबद्ध होती थी। सामाजिक पदानुक्रम में निम्न स्थान के बावजूद, ये समूह आर्थिक रूप से अपरिहार्य थे और ग्रामीण समाज की अपेक्षाकृत आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने में इनकी भूमिका निर्णायक थी।



