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मराठा दुर्ग, मराठा सैन्य और प्रशासनिक व्यवस्था का आधार थे, जो उनकी रणनीतिक प्रतिभा और स्थापत्य कौशल को दर्शाते हैं। सह्याद्रि पर्वतमालाओं और कोंकण तट पर फैले ये बारह दुर्गों का एक समूह हैं। रायगढ़, शिवनेरी, सिंहगढ़, तोरण, प्रतापगढ़, पुरंदर, पन्हाला, लोहागढ़, सिंधुदुर्ग और मुरुड–जंजीरा जैसे दुर्गों ने क्षेत्र की रक्षा करने और व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। छत्रपति शिवाजी महाराज के शासनकाल में रायगढ़ मराठा साम्राज्य की राजधानी था, जबकि शिवनेरी उनका जन्मस्थान था। सिंहगढ़ और तोरण जैसे पर्वतीय दुर्ग अंतर्देशीय मार्गों की रक्षा करते थे, वहीं सिंधुदुर्ग जैसे समुद्री दुर्ग तटरेखा की सुरक्षा के लिए बनाए गए थे। प्राकृतिक भूभाग का कुशल उपयोग, मजबूत बुर्ज, गुप्त द्वार और जल-प्रबंधन प्रणालियों से निर्मित ये दुर्ग मराठा वीरता, दृढ़ता और शासनकला के प्रतीक हैं।

मराठा काल के मंदिर और तीर्थस्थल राजनीतिक उथल-पुथल के युग में धार्मिक सुदृढ़ता, सांस्कृतिक निरंतरता और स्थापत्य संरक्षण के शाश्वत प्रतीक के रूप में विद्यमान हैं। गोवा में कदंब राजवंश के प्राचीन राजकीय आराध्य सप्तकोटेश्वर मंदिर को इस्लामी और पुर्तगाली शासन के दौरान निरंतर विध्वंस का सामना करना पड़ा। 1668 में छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा इस क्षेत्र को स्वतंत्र करने के पश्चात नरवे में इसका पुनरुद्धार, पवित्र स्थलों की पुनर्स्थापना के प्रति मराठों की अटूट प्रतिबद्धता को परिलक्षित करता है। इसी प्रकार से, पुर्तगाली शासन के पुनः प्रभावी होने के बावजूद, कावले स्थित श्री शांतादुर्गा मंदिर तथा मंगेशी स्थित श्री मंगेश मंदिर अठारहवीं शताब्दी में मराठा संरक्षण में ही समृद्ध हुए। महाराष्ट्र में वेरुल का घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग, जो भोसले वंश के कुलदेवता थे, को होल्करों और अहिल्याबाई होल्कर सहित अनेक मराठा सरदारों द्वारा समय-समय पर पुनर्निर्मित एवं संवर्धित किया गया। मराठा मंदिर स्थापत्य ने प्राचीन यादव परंपराओं के साथ दक्कनी और मुगल प्रभावों का समन्वय किया। यह कलात्मक परिपक्वता तासगांव के गणेश मंदिर जैसे स्मारकों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जो मराठा समृद्धि, भक्ति और कलात्मक संकलन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

 

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