पश्चिमी गंग वंश: पश्चिमी गंग वंश की उत्पत्ति के विषय में विभिन्न मत प्रचलित हैं, जो उन्हें इक्ष्वाकु वंश, गंगा नदी अथवा कण्वों से संबद्ध मानते हैं। चौथी शताब्दी ईसवी में कोंगणिवर्मन (दिदिंग) माधव द्वारा स्थापित यह साम्राज्य मैसूर क्षेत्र में विस्तृत था, जिसे 'गंगवाड़ी' के नाम से जाना जाता था। कालांतर में शासक हरिवर्मन ने राजधानी को कुलुवला से तलकाड़ स्थानांतरित कर दिया। इस वंश का प्रतापी शासक दुर्विनीत पल्लवों के साथ हुए संघर्ष में विजयी हुआ। परंतु आठवीं-नवीं शताब्दियों में उसका सामना वेंगी के चालुक्यों और राष्ट्रकूट शासक ध्रुव के साथ हुआ। तत्पश्चात, 1004 ईसवी तक चोल और गंगों का संघर्ष निरंतर जारी रहा, और अंततः तलकाड़ पर चोलों के अधिकार के साथ ही गंग संप्रभुता का अंत हो गया।
सांस्कृतिक दृष्टि से, गंग शासक जैन धर्म के अनुयायी थे, जिसका चरमोत्कर्ष राजमल्ल चतुर्थ के शासनकाल में दिखाई देता है। उसके मंत्री चामुंडराय ने 983 ईसवी में श्रवणबेलगोला में बाहुबली गोमतेश्वर की 58 फीट ऊंची प्रतिमा का निर्माण करवाया था, जो भारतीय मूर्तिकला की एक अद्वितीय उपलब्धि है।
होयसल वंश: होयसल वंश का संस्थापक संभवतः एक क्षत्रिय था जिसका नाम सल या साल था। होयसल वंश का पुनरुद्भव लगभग ग्यारहवीं सदी के आरंभ में हुआ। होयसल वंश ने बिट्टिग विष्णुवर्धन (1108-1142 ईसवी) के शासनकाल में प्रभुत्व प्राप्त किया। उसने अपनी राजधानी को वेलपुरा से द्वारसमुद्र (हेलेबिड) स्थानांतरित किया और स्वयं को चालुक्य अधिपति, विक्रमादित्य षष्ठ से स्वतंत्र घोषित कर लिया। माना जाता है कि उसने चोल, पांड्य और कदंब शासकों को पराजित किया था। इस वंश का अगला महत्वपूर्ण शासक वीर बल्लाल द्वितीय (1173-1220) था, जिसने सर्वप्रथम महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। इस वंश का अंतिम शासक वीर बल्लाल तृतीय था। मलिक काफूर (1310) के आक्रमणों ने इस साम्राज्य को तहस-नहस कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप चौदहवीं शताब्दी के मध्य के आस-पास होयसल वंश का अंत हो गया।
होयसल शासक महान मंदिर निर्माता थे, जिनकी स्थापत्य कला के सर्वोच्च उदाहरण हासन जिले के बेलूर में स्थित चेन्नाकेशव मंदिर (भगवान विष्णु को समर्पित) और हेलेबिड (या द्वारसमुद्र) में शिव को समर्पित होयसलेश्वर मंदिर हैं। इन मंदिरों में स्थापत्य कला (नक्काशीदार पंखुड़ियों के रूप में समृद्ध अलंकरण) चालुक्य शैली की निरंतरता को दर्शाने के साथ ही मूर्तिकला के माध्यम से जीवन और धर्म के घनिष्ठ संबंध को प्रदर्शित करती है। होयसल मंदिरों की इस विशिष्ट स्थापत्य शैली के कारण होयसलों द्वारा निर्मित मंदिर समूह को यूनेस्को के विश्व धरोहरों में स्थान प्रदान किया गया है।
कदंब वंश: तालगुंड स्तंभलेख में उल्लेख है कि कदंब वंश का नाम 'कदंब वृक्ष' से उत्पन्न हुआ है, जिसे उनके संरक्षक देवता स्वामी महासेन या कार्तिकेय द्वारा पवित्र माना जाता था। वे हारित के वंशज होने का दावा करते थे और मानव्य गोत्र के ब्राह्मण थे।
चौथी शताब्दी के मध्य में, समुद्रगुप्त के दक्षिणी अभियान (दक्षिणापथ अभियान) और उसके फलस्वरूप पल्लवों की शक्ति में आई कमी ने एक राजनीतिक शून्यता उत्पन्न की, जिसका लाभ उठाकर दक्षिण-पश्चिम भारत में कदंबों का उदय हुआ।
मयूरशर्मन या मयूरशर्मा, जिसने 345 से 360 ईसवी तक शासन किया, ने बनवासी को अपनी राजधानी बनाकर इस साम्राज्य की नींव रखी। ऐसा माना जाता है कि उसने उन पल्लवों पर आक्रमण कर दिया जिन्होंने उसे पश्चिमी समुद्र और प्रेहारा (संभवतः मालप्रभा या तुंगभद्रा नदी) के बीच के क्षेत्र में शासन करने की अनुमति दी थी। कहा जाता है कि कांचीपुरम् में ब्राह्मण धर्म का अध्ययन कर रहे मयूरशर्मन को एक पल्लव अश्वारोही ने अपमानित किया था, जिसके पश्चात अपनी शिक्षा छोड़कर उसने शस्त्र उठाया और कदंब वंश की स्थापना की।
कंगवर्मन अपने पिता का उत्तराधिकारी बना और उसने 360 से 385 ईसवी तक शासन किया। उसने अपने वंश का नाम 'शर्मन' से बदलकर 'वर्मन' कर दिया। उसके बाद उसका पुत्र भगीरथ सिंहासनारुढ़ हुआ, उसने 385 से 410 ईसवी तक शासन किया। भगीरथ का उत्तराधिकारी उसका बड़ा पुत्र रघु था, जिसने अपने छोटे भाई काकुत्सवर्मन को अपना युवराज घोषित किया। रघुवर्मन ने 410 से 425 ईसवी के बीच शासन किया और उसके बाद उसका छोटा भाई गद्दी पर बैठा क्योंकि उसकी अपनी कोई संतान नहीं थी। काकुस्तवर्मन, जिसने 425 से 450 ईसवी के बीच शासन किया, ने साम्राज्य को वैभव के शिखर पर पहुंचाया। वह शानदार महलों के निर्माण और तालगुंड के शिव मंदिर के पास मीठे पानी की एक विशाल झील की खुदाई करवाने के लिए प्रसिद्ध है।
काकुत्सवर्मन के पश्चात उसका पुत्र शांतिवर्मन (450-75 ईसवी) शासक बना। उसने अपने राज्य का दक्षिणी भाग अपने भाई कृष्णवर्मन को सौंप दिया, जो पल्लव शासकों के साथ हुए संघर्ष में मारा गया। शांतिवर्मन के पश्चात मृगेशवर्मन (475-90 ईसवी) सिंहासन पर बैठा। उसका भी पल्लवों के साथ संघर्ष हुआ जिसमें वह विजयी रहा। अपने शासन विस्तार के दौरान उसने गंग राज्य पर भी अधिकार कर लिया। उसके बाद रविवर्मन इस वंश का एक महत्वपूर्ण शासक हुआ, जिसने अपने शत्रुओं को पराजित किया। किंतु उसके उत्तरवर्ती शासक अयोग्य सिद्ध हुए, जिसके कारण धीरे-धीरे कदंब वंश का शासन कमजोर पड़ने लगा और अंततः बनवासी पर चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय के अधिकार के साथ ही इस वंश का अंत हो गया।
पूर्वी चालुक्य: पूर्वी चालुक्य वंश, जिसे वेंगी के चालुक्यों के नाम से भी जाना जाता है, प्रारंभिक मध्यकालीन दक्षिण भारत के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस राजवंश ने सातवीं से बारहवीं शताब्दी ईसवी के मध्य वर्तमान तटीय आंध्र प्रदेश के उर्वर क्षेत्र वेंगी पर शासन किया। मूलतः बादामी के चालुक्यों की एक शाखा के रूप में स्थापित यह राजवंश न केवल दक्कन की राजनीति का एक प्रमुख केंद्र बना, बल्कि इसने दक्षिण भारत के भाषाई और सांस्कृतिक एकीकरण में भी निर्णायक भूमिका निभाई। विशेष रूप से तेलुगु साहित्य और द्रविड़ वास्तुकला के विकास में इनका अतुलनीय योगदान रहा है।
पूर्वी चालुक्य राजवंश की उत्पत्ति ऐतिहासिक रूप से बादामी के चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय के भाई कुब्जा विष्णुवर्धन से हुई मानी जाती है। लगभग 624 ईसवी में, विष्णुकुंडिनों के विरुद्ध सफल सैन्य अभियानों के पश्चात, पुलकेशिन द्वितीय ने विष्णुवर्धन को वेंगी क्षेत्र का प्रांतीय शासक नियुक्त किया था। कालांतर में, पल्लव आक्रमण के कारण बादामी के चालुक्यों की केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने पर वेंगी शाखा ने अपनी स्वायत्तता की घोषणा कर दी। विष्णुवर्धन और उसके परवर्ती शासकों ने अपनी कूटनीतिक और सैन्य कुशलता से वेंगी को न केवल एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित किया, बल्कि इसे दक्षिण भारत के एक अत्यंत शक्तिशाली और समृद्ध क्षेत्रीय साम्राज्य के रूप में भी विकसित किया।
रणनीतिक दृष्टिकोण से, पूर्वी चालुक्यों ने दक्कन के पठार और सुदूर दक्षिण के तमिल क्षेत्रों के मध्य एक महत्वपूर्ण मध्यवर्ती राज्य (Buffer State) के रूप में कार्य किया। इस राजवंश का इतिहास मुख्य रूप से क्षेत्रीय प्रभुत्व को लेकर कांची के पल्लवों, राष्ट्रकूटों और बाद में तंजौर के चोलों के साथ निरंतर संघर्षों के लिए जाना जाता है। दसवीं शताब्दी के उपरांत, पूर्वी चालुक्यों ने अपनी स्थिति सुदृढ़ करने हेतु चोलों के साथ घनिष्ठ वैवाहिक संबंध स्थापित किए। इस नीति का चरमोत्कर्ष राजराजा के शासनकाल में देखा गया, जिसका पुत्र कुलोत्तुंग प्रथम चोल राजसिंहासन पर बैठा। इस घटना ने वेंगी क्षेत्र को प्रभावी रूप से चोल साम्राज्य की शाही व्यवस्था में एकीकृत कर दिया, जिससे पूर्वी चालुक्यों को अपने क्षेत्रीय आधार के अतिरिक्त एक व्यापक साम्राज्यिक महत्व प्राप्त हुआ।
पूर्वी चालुक्य राजवंश का अवसान ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में चोलों के बढ़ते साम्राज्यवादी प्रभुत्व और उत्तराधिकार के आंतरिक संघर्षों के कारण प्रारंभ हुआ। बारहवीं शताब्दी के आरंभ तक, वेंगी का स्वतंत्र राज्य पूरी तरह से चोल साम्राज्य में विलीन हो गया, जिससे एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई के रूप में इस राजवंश का अंत हो गया। यद्यपि इनका राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो गया, तथापि पूर्वी चालुक्यों ने दक्षिण भारत के व्यापक राजनीतिक एकीकरण और विशेष रूप से तेलुगु भाषी क्षेत्र के भाषाई तथा सांस्कृतिक सुदृढ़ीकरण पर एक अमिट छाप छोड़ी, जो परवर्ती इतिहास में भी प्रासंगिक बनी रही।
पूवी चालुक्यों का प्रशासनः पूर्वी चालुक्यों की प्रशासनिक व्यवस्था ने मुख्य रूप से दक्कन प्रतिरूप का अनुसरण किया, जिसमें सत्ता का विकेंद्रीकरण प्रमुख था। प्रशासनिक सुविधा हेतु संपूर्ण साम्राज्य को 'विषय' (आधुनिक जिलों के समान) और 'राष्ट्र' (प्रांतों) जैसी इकाइयों में विभाजित किया गया था। इन क्षेत्रों में स्थानीय अधिकारियों और अधीनस्थ सामंतों ने महत्वपूर्ण स्वायत्तता का उपभोग किया। अर्थव्यवस्था प्रमुख रूप से एक कृषि-आधारित प्रणाली थी, जो ब्राह्मणों को दिए जाने वाले 'ब्रह्मदेय' और मंदिरों को समर्पित 'देवदान' ग्रामों के व्यापक प्रचलन से प्रमाणित होती है। इन अनुदानों ने ब्राह्मणवादी और धार्मिक संस्थानों के महत्व में वृद्धि की। इसके अतिरिक्त, पुरातात्विक साक्ष्यों और शिलालेखों से एक सुव्यवस्थित राजस्व प्रणाली का स्पष्ट संकेत मिलता है, जिसका प्राथमिक आधार भूमि कर था।



