लियोपोल्ड वॉन रांके (1795-1886) को सर्वसम्मति से 'आधुनिक वैज्ञानिक इतिहास लेखन का जनक' स्वीकार किया जाता है। 'बर्लिन क्रांति' शब्दावली इतिहास लेखन की कार्यप्रणाली में उस युगांतरकारी परिवर्तन का प्रतीक है, जिसका सूत्रपात उन्नीसवीं शताब्दी में बर्लिन विश्वविद्यालय में रांके के नेतृत्व में हुआ था। इस वैचारिक परिवर्तन ने इतिहास लेखन में एक 'विभाजक रेखा' का कार्य किया, जिसने इस विषय को केवल साहित्यिक और दार्शनिक आख्यानों के दायरे से बाहर निकालकर एक वस्तुनिष्ठ, वैज्ञानिक एवं साक्ष्य-आधारित उपागम की ओर उन्मुख किया।
रांके के उद्भव से पूर्व, इतिहास लेखन प्रायः नैतिक निर्णयों, अति-सामान्यीकरणों अथवा राष्ट्रवादी आख्यानों से प्रभावित था। रांके के शोधपरक कार्यों ने इतिहास को एक 'विशिष्ट अकादमिक विषय’ के रूप में पुनर्स्थापित किया, जो प्राथमिक स्रोतों के गहन एवं कठोर विश्लेषण पर आधारित था। बर्लिन विश्वविद्यालय से प्रारंभ हुआ और उनके शिष्यों द्वारा प्रसारित यह कार्यप्रणालीगत रूपांतरण ही इतिहास लेखन की दुनिया में 'बर्लिन क्रांति' के नाम से विख्यात हुआ।
बर्लिन क्रांति की मुख्य विशेषताएं: रांके ने इस तथ्य पर बल दिया कि इतिहासकारों को अनिवार्य रूप से मूल स्रोतों पर ही आश्रित रहना चाहिए, जिनमें राजकीय अभिलेख, कूटनीतिक पत्राचार, निजी पत्र एवं प्रत्यक्षदर्शियों के वृत्तांत प्रमुख हैं। उनके मतानुसार, ऐतिहासिक आख्यानों का निर्माण मिथकों, दंतकथाओं अथवा द्वितीयक विवरणों के स्थान पर इन्हीं प्रामाणिक एवं मूल साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।
उनका प्रसिद्ध सिद्धांत “wie es eigentlich gewesen ist” अर्थात "इतिहास को उसी रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए जैसा वह वास्तव में घटित हुआ था", ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता का आधारभूत मानक बन गया। इसके अंतर्गत इतिहासकारों से यह अपेक्षा की गई कि वे व्यक्तिगत मान्यताओं अथवा वैचारिक पूर्वाग्रहों का परित्याग कर पूर्णतः तथ्यात्मक सटीकता पर अपना ध्यान केंद्रित करें।
रांके का दृष्टिकोण मुख्य रूप से राज्य के कूटनीतिक संबंधों, राजनीतिक घटनाओं और कुलीन वर्ग के लोगों पर केंद्रित था। यद्यपि इसने राजनीतिक इतिहास के व्यवसायीकरण में मदद की, तथापि इसका अर्थ यह भी था कि प्रारंभिक जर्मन इतिहास लेखन में सामाजिक और आर्थिक आयामों को कम महत्व दिया गया।



