भारतीय इतिहास लेखन की आधुनिक प्रवृत्तियां अतीत की व्याख्या और लेखन में एक महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन को दर्शाती हैं। समकालीन इतिहास लेखन अब केवल राजनैतिक घटनाओं और शासक वर्ग तक सीमित न रहकर सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक पहलुओं को भी शामिल करता है। भारत में प्रारंभिक ऐतिहासिक चेतना के निर्माण में जैन एवं बौद्ध परंपराओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिन्होंने नैतिक मूल्यों, कर्म-सिद्धांत, अहिंसा तथा संन्यासी जीवन पर विशेष बल दिया। इन परंपराओं के प्रभावस्वरूप व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन हुए तथा पालि, प्राकृत और संस्कृत में समृद्ध साहित्य की रचना हुई, जिससे इतिहास सामान्य जन तक पहुंचा।
एक अन्य महत्वपूर्ण प्रवृत्ति इतिहास–पुराण परंपराओं, रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों तथा राजतरंगिणी जैसे शास्त्रीय ग्रंथों की ऐतिहासिक प्रासंगिकता को स्वीकार करना जो पौराणिक कथाएं, वंशावली और ऐतिहासिक आख्यान को सम्मिलित करता है। यद्यपि पद्धतिगत दृष्टि से ये आधुनिक इतिहास लेखन जैसे नहीं हैं, तथापि ये महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्मृतियों को बनाए रखे हुए हैं। मध्यकालीन इतिहास लेखन में जियाउद्दीन बरनी, अबुल फजल और फरिश्ता जैसे विद्वानों ने वृत्तांतों, प्रशासनिक अभिलेखों तथा जीवनीपरक लेखन को शामिल किया।
औपनिवेशिक इतिहास लेखन ने एक निर्णायक चरण को चिह्नित किया, जिसमें भारतीय इतिहास की व्याख्या प्रायः यूरोप या यूरोपीय लोगों के नजरिए से तथा साम्राज्यवादी दृष्टिकोणों के माध्यम से की गई। इसके प्रत्युत्तर में एक सशक्त राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया हुई, जहां भारतीय इतिहासकारों ने अतीत की पुनर्व्याख्या करने, राष्ट्रीय गौरव की पुनर्स्थापना करने, तथा औपनिवेशिक पूर्वाग्रहों के खंडन का प्रयास किया। बीसवीं शताब्दी में भारतीय इतिहास लेखन, मार्क्सवादी, क्षेत्रीय एवं अंतर्विषयक दृष्टिकोणों के साथ, जिनका केंद्र हाशिये पर स्थित वर्गों, अर्थव्यवस्था और समाज था, और भी विविध हो गया। परिणामस्वरूप, समकालीन प्रवृत्तियां आलोचनात्मक विश्लेषण, स्रोतों की बहुलता तथा भारत के अतीत की अधिक समावेशी समझ पर बल देती हैं।



