आपातकाल: आपातकाल (जून 1975–मार्च 1977) भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक अत्यंत संवेदनशील चरण का प्रतिनिधित्व करता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अनुशंसा पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद द्वारा ‘आंतरिक अशांति’ से राज्य की संरक्षा करने संबंधी संवैधानिक प्रावधान के अंतर्गत की गई इस घोषणा ने देश के राजनीतिक परिदृश्य को परिवर्तित कर दिया। इस अवधि में नागरिक स्वतंत्रताओं के व्यापक निलंबन, प्रेस पर सेंसरशिप और विपक्षी नेताओं की सामूहिक गिरफ्तारियों ने लोकतांत्रिक मूल्यों के समक्ष गंभीर चुनौती उत्पन्न की। न्यायपालिका की शक्तियों में कटौती की गई और जबरन नसबंदी सहित कई विवादास्पद नीतियों का क्रियान्वयन किया गया। यद्यपि शासन द्वारा इन कठोर उपायों को व्यवस्था की पुनर्स्थापना के नाम पर न्यायोचित ठहराने का प्रयास किया गया, तथापि व्यापक रूप से अधिनायकवादी (सत्तावादी) कदम के रूप में आपातकाल की आलोचना की गई। अंततः, 1977 में आपातकाल की समाप्ति और उसके पश्चात हुए आम चुनावों में इंदिरा गांधी की पराजय ने न केवल भारत में लोकतांत्रिक जवाबदेही को पुनः स्थापित किया, बल्कि भारत की राजनीतिक चेतना को एक नई दिशा प्रदान की।
भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही भारत ने मिश्रित आर्थिक मॉडल का अनुसरण किया, जो समाजवादी नियोजन और बाजार-आधारित तंत्र के मध्य समन्वय पर आधारित था। कालांतर में, अत्यधिक विनियमन, निम्न उत्पादकता और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की अकुशलता ने आर्थिक विकास को बाधित किया। 1991 में भुगतान संतुलन के गंभीर संकट ने भारत को अपनी विकास रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। इसकी प्रतिक्रिया में, सरकार ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) पर आधारित 'नई आर्थिक नीति' की शुरुआत की।
उदारीकरण का उद्देश्य उद्योगों को विनियमित करना, वित्तीय क्षेत्र में सुधार लाना, कर प्रणाली को तर्कसंगत बनाना तथा व्यापार एवं विदेशी मुद्रा बाजार को खोल कर सरकारी नियंत्रण को कम करना था। निजीकरण के माध्यम से सरकारी स्वामित्व के विनिवेश और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को स्वायत्तता प्रदान कर उनकी कार्यक्षमता में सुधार का लक्ष्य रखा गया। वहीं, वैश्वीकरण ने व्यापार उदारीकरण, विदेशी निवेश, आउटसोर्सिंग तथा विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसी वैश्विक संस्थाओं में भागीदारी के द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत किया।
इन सुधारों ने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि को गति प्रदान की, विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि की और सेवा क्षेत्र का विस्तार किया। यद्यपि, इससे रोजगार सृजन, कृषि, असमानता और सामाजिक कल्याण से संबंधित चिंताएं भी उत्पन्न हुईं। इस प्रकार, एलपीजी सुधारों ने अवसरों के साथ-साथ चुनौतियां भी प्रस्तुत कीं और भारत के आर्थिक परिदृश्य को नया आयाम दिया।



