स्वतंत्रता के पश्चात, भारत ने तीव्र औद्योगिकीकरण, बुनियादी ढांचे के विस्तार और राष्ट्र-निर्माण के उद्देश्य से नियोजित आर्थिक विकास का मॉडल अपनाया। यद्यपि इस रणनीति ने आर्थिक संवृद्धि और राज्य के सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया, तथापि इसने बड़े पैमाने पर विस्थापन जैसी गंभीर चुनौतियां भी उत्पन्न कीं, जिससे विशेष रूप से आदिवासी समुदाय प्रभावित हुए। विकास के लक्ष्यों और सामाजिक न्याय के मध्य यह अंतर्विरोध स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक निरंतर बनी रहने वाली समस्या रही है।
भारत में वृहद् परियोजनाओं (जैसे बांध, खनन और भारी उद्योग) ने तीव्र आर्थिक संवृद्धि के लिए अनिवार्य आधार तैयार किया, किंतु सदियों से जल, जंगल और भूमि पर निर्भर रहने वाले आदिवासी समुदाय इस प्रक्रिया में सर्वाधिक प्रभावित हुए। भाखड़ा नांगल, हीराकुड, राउरकेला स्टील प्लांट और बाद में मध्य भारत में खनन परियोजनाओं जैसी पहलों के कारण लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ा। विस्थापितों में आदिवासियों का प्रतिशत सर्वाधिक था। यह केवल भौतिक विस्थापन नहीं था, बल्कि इसने उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक ताने-बाने और पारंपरिक आजीविका प्रणालियों को भी छिन्न-भिन्न कर दिया।
भारत में पुनर्वास और पुनर्स्थापन नीतियों के कमजोर कार्यान्वयन ने विस्थापित समुदायों, विशेषकर आदिवासियों के संकट को और गहरा कर दिया। भूमि स्वामित्व के कानूनी दस्तावेजों के अभाव में मुआवजा प्रायः अप्राप्त या अपर्याप्त रहा, जिससे उनकी आर्थिक सुरक्षा प्रभावित हुई। निर्वाह-आधारित अर्थव्यवस्था से नकद-आधारित बाजार अर्थव्यवस्था की ओर इस अनियोजित संक्रमण ने आदिवासियों को निर्धनता और अनौपचारिक श्रम की ओर धकेल दिया। समावेशी विकास की इस विफलता ने न केवल उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को कमजोर किया, बल्कि राज्य की कल्याणकारी भूमिका के प्रति जन-विश्वास को भी कम किया।
पारंपरिक वन संसाधनों तक पहुंच को प्रतिबंधित करने वाली औपनिवेशिक विरासत पर आधारित वन नीतियों और कठोर संरक्षण कानूनों ने आदिवासी संकट को और अधिक गंभीर बना दिया है। यद्यपि इन नीतियों का उद्देश्य पर्यावरणीय स्थिरता था, परंतु इन्होंने अकसर आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों की उपेक्षा की, जिससे वन विभागों और स्थानीय समुदायों के बीच निरंतर संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती रही। इस प्रकार के बहिष्करणकारी उपागमों ने आदिवासियों में अलगाव की भावना को सुदृढ़ किया है और कई क्षेत्रों में असंतोष एवं अशांति को जन्म दिया, जो आंतरिक सुरक्षा के लिए भी एक चुनौती है।
विस्थापन और वंचना के राजनीतिक परिणाम भी सामने आए। मध्य और पूर्वी भारत के क्षेत्रों में जनजातीय समुदायों की अनसुलझी शिकायतों ने विरोध आंदोलनों के लिए अनुकूल आधार प्रदान किया, जिनमें झारखंड, तेलंगाना और बाद में वामपंथी उग्रवाद जैसे आंदोलन शामिल हैं। साथ ही, जनजातीय हितों की रक्षा के लिए पांचवीं और छठी अनुसूची, पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996, अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006, भूमि अर्जन, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013 जैसे संवैधानिक प्रावधान और कानून लागू किए गए, किंतु उनका कार्यान्वयन असमान और अपूर्ण बना रहा।
संक्षेप में, स्वतंत्रता के बाद भारत की विकास प्रक्रिया एक गहरे विरोधाभास को उजागर करती है। एक ओर यह राष्ट्र-निर्माण, आर्थिक विकास और आधुनिकता की आकांक्षाओं से प्रेरित रही, तो दूसरी ओर इसने जनजातीय समुदायों पर विस्थापन, आजीविका ह्रास और सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन जैसी गंभीर सामाजिक समस्या भी आरोपित कीं। परिणामस्वरूप, विकास के लाभ और उसके वितरण के बीच असमानता स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई। अतः जनजातीय, अधिकारों की सुरक्षा और उनकी सहभागी भूमिका सुनिश्चित करना केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न नहीं, बल्कि समावेशी, सतत और न्यायपूर्ण विकास की अनिवार्य शर्त है।



