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नौकरशाही की संरचना: लगभग दो शताब्दियों के ब्रिटिश शासन के दौरान, भारत में नौकरशाही को औपनिवेशिक नियंत्रण के एक शक्तिशाली और कुशल साधन के रूप में सुव्यवस्थित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता का कल्याण नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना और साम्राज्यवादी हितों की रक्षा करना था। भारतीय सिविल सेवा (ICS) के वर्चस्व वाली नौकरशाही ने नीति-निर्धारण एवं उनके क्रियान्वयन पर व्यापक अधिकारों का प्रयोग किया तथा यह कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका, तीनों क्षेत्रों में एकसाथ सक्रिय थी। सत्ता के इस संकेंद्रण ने इसे अभूतपूर्व प्रतिष्ठा और स्वायत्तता प्रदान की, जिसके परिणामस्वरूप नौकरशाही के हित प्रायः जन-आकांक्षाओं पर हावी रहे।

प्रशासनिक दृष्टिकोण से, ब्रिटिश शासन ने एक कठोर पद-आधारित वर्गीकरण प्रणाली लागू की, जिसके तहत सेवाओं को इंपीरियल और प्रोविंशियल (प्रांतीय) संवर्गों में विभक्त किया गया। इंपीरियल सेवाओं में मुख्यतः इंग्लैंड से भर्ती किए गए यूरोपीय अधिकारियों का वर्चस्व था, जिन्हें भारतीयों द्वारा संचालित प्रोविन्शियल सेवाओं की तुलना में उच्चतर दर्जा और अधिकार प्राप्त थे। इसने नस्लीय एवं पदानुक्रमिक विषमताओं को और सुदृढ़ किया। केंद्रीकरण इस व्यवस्था का एक अन्य आधारभूत विशेषता थी, जहां वास्तविक शक्ति गवर्नर-जनरल और सचिवालय में निहित थी, जिससे निचले स्तरों पर स्वतंत्र पहल की संभावनाएं क्षीण हो गईं। स्थानीय प्रतिबद्धताओं को हतोत्साहित करने हेतु निरंतर स्थानांतरण की नीति अपनाई गई, जिसका प्रतिकूल प्रभाव प्रायः प्रशासनिक दक्षता पर पड़ता था।

भर्ती प्रक्रिया में प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से पश्चिमी उदारवादी शिक्षा को प्रधानता दी गई, जिसके फलस्वरूप तकनीकी विशेषज्ञों के स्थान पर सामान्य प्रशासकों के एक विशिष्ट वर्ग का उद्भव हुआ। उच्च वेतनमान, व्यापक विशेषाधिकारों और सुरक्षित नौकरी ने जनसामान्य से सामाजिक दूरी बनाए रखते हुए औपनिवेशिक राज्य के प्रति उनकी अटूट निष्ठा सुनिश्चित की। प्रशासन जटिल नियमों और प्रक्रियाओं द्वारा संचालित था, जिससे लालफीताशाही, विलंब और भ्रष्टाचार जैसी प्रवृत्तियों को बल मिला। वस्तुतः, औपनिवेशिक नौकरशाही का स्वरूप सत्तावादी, केंद्रीकृत और अभिजातवर्गीय था। सेवा के स्थान पर शासन के लिए निर्मित इस संरचना और इसके मूल्यों ने एक ऐसी स्थायी विरासत छोड़ी, जिसे स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक और विकासात्मक लक्ष्यों के अनुरूप ढालने हेतु प्रशासनिक सुधारों की कठिन चुनौती का सामना करना पड़ा।

नई शिक्षा नीति: भारतीय समाज में शिक्षा का सदैव एक केंद्रीय स्थान रहा है और इसे राष्ट्रीय विकास के एक सशक्त साधन के रूप में देखा गया है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान, महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने ऐसी शिक्षा पर बल दिया जो जीवन और आजीविका के साथ अंतर्संबंधित हो। गांधीजी की बुनियादी शिक्षा की अवधारणा का उद्देश्य बौद्धिक अधिगम और शारीरिक श्रम के मध्य सामंजस्य स्थापित करना था, ताकि शिक्षा को सामाजिक रूप से प्रासंगिक बनाया जा सके। स्वातंत्र्योत्तर काल में, भारत सरकार ने राष्ट्र की प्रगति, अखंडता और सुरक्षा में शिक्षा की निर्णायक भूमिका को रेखांकित करते हुए, शैक्षिक पुनर्गठन को अपनी नीतिगत प्राथमिकताओं में शीर्ष स्थान प्रदान किया।

विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (1948-49), माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952-53) और शिक्षा आयोग (1964-66) सहित विभिन्न आयोगों ने तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था की कमियों का विश्लेषण किया। उनकी अनुशंसाओं ने एक व्यापक 'नई शिक्षा नीति' की नींव रखी। इस नीति का लक्ष्य शिक्षा में पूर्ण रूप से सुधार करना था ताकि आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सांस्कृतिक उन्नति को प्रोत्साहित किया जा सके।

नीति की प्रमुख विशेषताओं में 14 वर्ष की आयु तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा, शिक्षकों की स्थिति और प्रशिक्षण में सुधार, तथा शैक्षिक अवसरों की समानता शामिल था। त्रि-भाषा सूत्र के माध्यम से हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं के विकास पर विशेष बल दिया गया। विकासशील अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, कृषि, उद्योग तथा व्यावसायिक शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया।

नीति में कार्यानुभव, राष्ट्रीय सेवा, प्रौढ़ शिक्षा, परीक्षा सुधार तथा साक्षरता के प्रसार पर भी विशेष बल दिया गया। इसमें एक समान 10+2+3 शैक्षिक संरचना को अपनाने तथा शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को राष्ट्रीय आय के 6 प्रतिशत तक बढ़ाने की सिफारिश की गई। समग्र रूप से, नई शिक्षा नीति का उद्देश्य संतुलित, समावेशी और आधुनिक शिक्षा प्रणाली के माध्यम से सक्षम, सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध नागरिक तैयार करना और राष्ट्रीय एकीकरण को सुदृढ़ करना था।

 

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