राष्ट्रीय आंदोलन में मध्यम वर्ग की भूमिका: ब्रिटिश शासन की स्थापना के समय भारतीय समाज मुख्यतः जातियों के आधार पर विभाजित था, किंतु औपनिवेशिक नीतियों ने सामाजिक गतिशीलता को तीव्र कर नवीन वर्गों के उदय का मार्ग प्रशस्त किया। यद्यपि इस संक्रमण काल ने सामाजिक विखंडन और संघर्षों को जन्म दिया, तथापि इसने पारंपरिक संकीर्ण पहचानों से ऊपर उठकर एक व्यापक राष्ट्रीय चेतना और एकीकृत विचारधारा को भी सूत्रबद्ध किया।
विदेशी शासन ने पारंपरिक राजनीतिक अभिजात वर्ग के वर्चस्व को समाप्त किया तथा भारत में एक नवीन मध्यम वर्ग के उदय की आधारभूमि तैयार की। इसी कालखंड में विकसित होते भारतीय पूंजीवाद और ब्रिटिश आर्थिक शोषण की बढ़ती आलोचना ने व्यापारियों एवं उद्यमियों को अपने हितों की रक्षा हेतु राष्ट्रवादी मुख्यधारा से जुड़ने को प्रेरित किया। यद्यपि औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों ने एक व्यापक गरीब एवं शोषित सर्वहारा वर्ग को भी जन्म दिया, किंतु वैचारिक स्पष्टता के अभाव में इनका राजनीतिक नेतृत्व मध्यम वर्ग के हाथों में ही केंद्रित रहा। प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत संगठित हड़तालों, ट्रेड यूनियनों के विस्तार और किसान सभाओं के गठन से ग्रामीण और औद्योगिक क्षेत्रों में राजनीतिक चेतना का तीव्र संचार हुआ, जहां मध्यम वर्ग ने इन विभिन्न सामाजिक शक्तियों को संगठनात्मक ढांचा और वैचारिक दिशा प्रदान कर नेतृत्व की भूमिका निभाई।
भारतीय मध्यम वर्ग में बुद्धिजीवी, पेशेवर, वेतनभोगी कर्मचारी, लोक सेवक, शिक्षक, अधिवक्ता, पत्रकार, व्यापारी तथा ग्रामीण उद्यमी जैसे विभिन्न समूह शामिल थे। प्रारंभ में शहरों में संकेंद्रित यह वर्ग, कालांतर में ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तारित हुआ। इस "बुद्धिजीवी वर्ग" ने भारतीय राजनीतिक विमर्श में संप्रभुता, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों जैसी आधुनिक अवधारणाओं का सूत्रपात किया। आंतरिक बहुरूपता के बावजूद, ए. आर. देसाई के मतानुसार, इसी वर्ग ने शैक्षिक एवं राजनीतिक लामबंदी के माध्यम से राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता के विचारों को व्यापक समाज तक पहुंचाने का कार्य किया, जिससे यह राष्ट्रीय आंदोलन के अग्रणी आयोजक और नेता के रूप में स्थापित हो गया।
पश्चिमी शिक्षा और उदारवादी-लोकतांत्रिक मूल्यों से अनुप्राणित भारतीय मध्यम वर्ग ने सुधारवाद, संवैधानिकवाद तथा प्रतिनिधिक संस्थाओं को अपने राजनीतिक दर्शन का केंद्र बनाया। प्रारंभिक दौर में प्रार्थना और याचिकाओं के माध्यम से ब्रिटिश न्यायप्रियता में अटूट विश्वास रखने वाले इस 'नरमपंथी' वर्ग का मोहभंग होने पर, इसमें चरमपंथी विचारधारा का उदय हुआ, जिसने स्वराज को अपना प्राथमिक एवं एकमात्र लक्ष्य घोषित किया। इसी वर्ग के नेतृत्व ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को एक संभ्रांतवादी संगठन से परिवर्तित कर एक सशक्त जन-आधारित संगठन का स्वरूप प्रदान किया, जिसने अंततः गांधीवादी युग के अहिंसक जन-आंदोलनों (जैसे असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन) के लिए उर्वर भूमि तैयार की। इस मध्यम बुद्धिजीवी वर्ग ने न केवल भारतीय समाज के विखंडित समूहों को राष्ट्रीय एकता के सूत्र में पिरोया, बल्कि संप्रभुता और धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्यों को समाहित कर स्वतंत्र भारत की वैचारिक एवं संवैधानिक आधारशिला भी सुदृढ़ की।
राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी ने न केवल स्वतंत्रता संग्राम को व्यापकता प्रदान की, बल्कि उनकी सामाजिक स्थिति में भी युगांतरकारी परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। प्रारंभिक दौर में छिटपुट उपस्थिति के पश्चात, उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों और राष्ट्रवादी चेतना के विस्तार ने महिलाओं को सार्वजनिक जीवन की मुख्यधारा में सम्मिलित किया। इस प्रकार, स्वतंत्रता संघर्ष औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक आंदोलन होने के साथ-साथ महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण और सामाजिक मुक्ति के एक उत्प्रेरक के रूप में भी उभरा।
उन्नीसवीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों ने भारतीय महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की सुदृढ़ नींव रखी। राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले और पंडिता रमाबाई जैसे सुधारकों ने सती प्रथा, बाल विवाह, तथा स्त्री शिक्षा के अभाव जैसी दमनकारी कुरीतियों पर प्रहार किया। इन प्रयासों से महिलाओं के लिए शिक्षा प्राप्ति के अवसर खुले और उनका सार्वजनिक जीवन में प्रवेश सुगम हुआ। इस प्रकार, इन सुधारों ने न केवल महिलाओं की सामाजिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि राष्ट्रवादी आंदोलन में उनकी सक्रिय राजनीतिक भागीदारी के लिए आवश्यक सामाजिक एवं वैचारिक आधारभूमि भी तैयार की।
प्रारंभिक राष्ट्रवादी चरण में महिलाओं की भागीदारी मुख्य रूप से अभिजात एवं शिक्षित वर्गों तक सीमित रही। सरोजिनी नायडू, और एनी बेसेंट जैसी प्रमुख नेत्रियों ने सार्वजनिक सभाओं में भाग लेने तथा राजनीतिक लेखन और सांगठनिक कार्यों में सक्रिय योगदान दिया। स्वदेशी एवं होम रूल आंदोलनों के दौरान, सिस्टर निवेदिता, सरला देवी चौधुरानी, मैडम भीकाजी कामा जैसी महिला नेताओं के नेतृत्व में महिलाओं ने बहिष्कार अभियानों, स्वदेशी उत्पादों के संवर्धन और राष्ट्रवादी प्रचार में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन (1920-1922), सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-1934) और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) जैसे आंदोलनों में महिलाओं ने व्यापक स्तर पर अंग्रेजों के विरुद्ध धरना प्रदर्शन में भाग लेने तथा लोगों को जागरूक करने के साथ ही गुप्त रूप से राष्ट्रवादी नेताओं और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की सहायता करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जहां अरुणा आसफ अली ने 1942 में गांधी जी तथा अन्य प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के पश्चात गोवालिया टैंक मैदान पर तिरंगा फहराकर 'अगस्त क्रांति' को नेतृत्व दिया, वहीं उषा मेहता ने 'कांग्रेस रेडियो' के माध्यम से भूमिगत रहकर प्रतिरोध की लौ जलाए रखी। कारावास की कठोरता और औपनिवेशिक अत्याचारों के बीच कस्तूरबा गांधी तथा सुचेता कृपलानी ने नेतृत्व की दृढ़ता का परिचय देते हुए स्वतंत्रता संग्राम को एक नैतिक और व्यापक जन-आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया।
क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के प्रसार में महिलाओं ने सशस्त्र विरोध और रणनीतिक प्रचार के माध्यम से औपनिवेशिक सत्ता को गंभीर चुनौती दी। मैडम भीकाजी कामा, कल्पना दत्त, प्रीतिलता वाडेकर और बीना दास जैसी क्रांतिकारियों ने भूमिगत गतिविधियों और प्रत्यक्ष संघर्ष में भाग लेकर महिलाओं की 'राजनीतिक निष्क्रियता' संबंधी रूढ़ियों को कड़ी चुनौती दी। अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (AIWC) जैसे संगठनों के माध्यम से हुई इस व्यापक लामबंदी ने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन को गति प्रदान की, बल्कि स्वतंत्र भारत में लैंगिक न्याय, कानूनी समानता और सामाजिक सुधारों की नींव भी सुदृढ़ की।
इसके अलावा, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महिलाएं केवल मुख्यधारा की राजनीति तक ही सीमित नहीं रहीं, अपितु उन्होंने किसान, आदिवासी और श्रमिक आंदोलनों—तेभागा आंदोलन, तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष और बारदोली सत्याग्रह—में भी कुशल आयोजकों और प्रदर्शनकारियों के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, और दमन के विरुद्ध प्रतिरोध के सशक्त प्रतीक के रूप में भी उभरीं। यद्यपि औपचारिक नेतृत्वकारी पदों पर उनका प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम रहा, तथापि स्वतंत्रता संग्राम को एक समावेशी और वास्तविक जन-आंदोलन का स्वरूप प्रदान करने में उनकी भूमिका अपरिहार्य थी।



