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महिलाओं से संबंधित प्रश्नः राष्ट्रवादी चर्चा: ब्रिटिश भारत में “महिलाओं से संबंधित मुद्दे” एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रसंग के रूप में रहा है, जिसमें औपनिवेशिक हितों, सामाजिक सुधार आंदोलनों, प्रारंभिक महिला संगठनों और कानूनी विकास का परस्पर प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। उन्नीसवीं शताब्दी में यह चर्चा मुख्यतः उभरते मध्यवर्गीय सुधारकों के प्रयासों से विकसित हुआ, जिन्होंने सती प्रथा, विधवा विवाह पर प्रतिबंध, बाल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या और महिला शिक्षा की उपेक्षा जैसी सामाजिक बुराइयों को चुनौती दी। साथ ही, यह प्रश्न ब्रिटिश शासन के तथाकथित “सभ्यता मिशन” से भी जुड़ा था, जिसके माध्यम से औपनिवेशिक सत्ता अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता स्थापित करना चाहती थी।

उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक सुधार चरण में राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे अग्रणी सुधारकों ने ‘सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन’ को अपने प्रयासों का केंद्रीय लक्ष्य बनाया। इस चरण के सुधारों का प्रमुख उद्देश्य महिलाओं को शिक्षा के माध्यम से सशक्त कर घरेलू एवं पारिवारिक संरचना के भीतर उनकी स्थिति को अधिक गरिमामय बनाना था। कालांतर में, पितृसत्तात्मक प्रथाओं की यह आलोचना तथा राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रसार ने महिलाओं के प्रश्नों को सामाजिक सुधार के सीमित दायरे से निकालकर राजनीतिक अधिकारों और राष्ट्र-निर्माण के व्यापक विमर्श का अंग बना दिया। इस प्रकार, महिलाओं से जुड़े प्रश्न समाज की लैंगिक संरचना और समकालीन राजनीतिक चेतना के क्रमिक विकास को प्रतिबिंबित करते हैं।

महिला संगठन: इस प्रसंग और चर्चा के बीच कई महिला संगठनों का उदय हुआ, जिन्होंने महिलाओं की चिंताओं को सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर स्पष्ट रूप से व्यक्त किया। इन संगठनों में प्रमुख संगठन पंडिता रमाबाई द्वारा 1882 के पुणे में स्थापित किया गया आर्य महिला समाज है जिसका प्रमुख उद्देश्य महिला शिक्षा को प्रोत्साहित तथा बाल विवाह जैसी कुप्रथा को रोकना था। सरला देवी चौधुरानी द्वारा स्थापित भारत स्त्री महामंडल (1910) और महिला सभा (1911) की स्थापना भी महिला शिक्षा को बढ़ावा देने और पर्दा प्रथा को समाप्त करने के उद्देश्य से की गई थी। एनी बेसेंट और मार्गरेट कजिन्स द्वारा मद्रास में स्थापित विमेंस इंडियन एसोसिएशन (WIA, 1917), ने महिलाओं के लिए मताधिकार की मांग की और सामाजिक-आर्थिक सुधारों की पैरवी की। नेशनल काउंसिल ऑफ विमेन इन इंडिया (NCWI, 1925), जिसका गठन इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ विमेन की एक शाखा के रूप में किया गया था, ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुधार जैसे विधायी मुद्दे के लिए विभिन्न स्थानीय महिला समूहों के बीच समन्वय स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित किया। ऑल इंडिया विमेंस कॉन्फ्रेंस (AIWC, 1927), जिसकी स्थापना मार्गरेट कजिन्स द्वारा की गई थी, सर्वाधिक प्रभावशाली संगठन बनकर उभरा, जिसने शारदा अधिनियम, 1929 और बाद में संपत्ति के अधिकारों एवं उत्तराधिकार कानूनों की पुरजोर वकालत की। अन्य समूहों, जैसे कि महिला राष्ट्रीय संघ, जिसका गठन 1928 में राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा बंगाल में किया गया था, ने महिला सशक्तिकरण को सीधे तौर पर भारत के राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ दिया।

महिलाओं से संबंधित ब्रिटिश कानून: औपनिवेशिक भारत में महिलाओं से संबंधित ब्रिटिश कानून “महिलाओं से संबंधित मुद्दों” से संबद्ध अन्य प्रमुख आयाम थे। कुछ शुरुआती और सबसे स्पष्ट सुधारों ने उन प्रथाओं को लक्षित किया जो प्रतीकात्मक रूप से महिलाओं के उत्पीड़न से जुड़ी थीं। गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक के अधीन लागू बंगाल सती रेग्यूलेशन, 1829 ने सती प्रथा को अवैध और दंडनीय अपराध घोषित कर दिया। हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 ने हिंदू विधवाओं के पुनर्विवाह को विधिक मान्यता प्रदान की, जिससे विधवा महिलाओं के जीवन पर थोपे गए रूढ़िवादी प्रतिबंधों को चुनौती मिली। सहमति की आयु अधिनियम, 1891 के माध्यम से भारतीय दंड संहिता में संशोधन किया गया और बालिकाओं के लिए सहमति की आयु को दस वर्ष से बढ़ाकर बारह वर्ष कर दिया गया; यह एक विवादास्पद कदम था जिसे पारंपरिक पारिवारिक नियमों में हस्तक्षेप के कारण विरोध का सामना करना पड़ा। इसके पश्चात के विधानों, जैसे बाल विवाह निषेध (शारदा) अधिनियम, 1929, ने सभी समुदायों में बाल विवाह पर अंकुश लगाने का प्रयास किया। ये कानून दर्शाते हैं कि कैसे औपनिवेशिक सत्ता, महिलाओं की कानूनी स्थिति एवं कल्याण को लेकर स्वदेशी अभियानों तथा राष्ट्रवादी प्रयासों के साथ जुड़ी हुई थी। कन्या भ्रूण हत्या निवारण अधिनियम, 1870 विशेष रूप से उत्तर और पश्चिम भारत के कुछ समुदायों में प्रचलित कन्या भ्रूण हत्या की प्रथा को रोकने के लिए लागू किया गया था। विवाहित स्त्री सम्पत्ति अधिनियम, 1874 ने विवाहित महिलाओं को अपने नाम पर संपत्ति रखने और उसे नियंत्रित करने की अनुमति दी। इसने उस कानूनी अवधारणा को चुनौती दी जिसके अनुसार महिला की संपत्ति पर केवल उसके पति का अधिकार माना जाता था।

लैंगिक पहचान एवं संवैधानिक स्थिति: भारत में लैंगिक पहचान का विकास ऐतिहासिक रूप से पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचों से प्रभावित रहा है, जिसके अंतर्गत लंबे समय तक महिलाओं को निजी एवं सार्वजनिक, दोनों ही क्षेत्रों में सदैव एक अधीनस्थ भूमिका में रखा गया। यद्यपि, स्वतंत्र भारत का संवैधानिक ढांचा इस दमनकारी विरासत को खत्म करने हेतु बिना किसी लैंगिक भेदभाव के महिलाओं को पूर्ण विधिक और राजनीतिक अधिकार प्राप्त एक नागरिक के रूप में प्रतिष्ठित करता है। भारतीय संविधान लैंगिक पहचान को किसी संकीर्ण व्याख्या में सीमित करने के बजाय एक व्यापक अधिकार-आधारित दृष्टिकोण के रूप में अंगीकार करता है, जहां समानता और मानवीय गरिमा के सिद्धांत सर्वोपरि हैं। यह संवैधानिक ढांचा न केवल प्राचीन काल से भारतीय समाज में व्याप्त विसंगतियों को दूर करता है, बल्कि एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना हेतु महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और उनकी स्वायत्तता भी सुनिश्चित करता है।

महिलाओं की संवैधानिक स्थिति का आधार भारत के संविधान की प्रस्तावना में निहित समानता और न्याय के सिद्धांतों में निहित है, जिन्हें मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, 15, 16, 21 और 23) तथा राज्य की नीति के निदेशक तत्वों [अनुच्छेद 39, 42, 243(घ) और अनुच्छेद 330(क)] द्वारा केवल सामाजिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी विधिक संरक्षण प्रदान किया गया है। यद्यपि यह स्थिति प्राप्त करने से पूर्व ब्रिटिश शासनाधीन भारत में महिलाओं को समान अधिकार, विशेष रूप से राजनीतिक अधिकार, प्राप्त करने हेतु एक लंबा संघर्ष करना पड़ा था। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक ब्रिटिश शासकों द्वारा महिलाओं को किसी भी पद, यहां तक कि मत देने के मामले में भी, के अयोग्य समझे जाने के कारण उन्हें उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा गया था। 1861 एवं 1892 के भारतीय परिषद अधिनियमों में महिलाओं को मतदान या प्रतिनिधित्व का कोई अधिकार प्रदान नहीं किया गया था। हालांकि, समाज सुधार आंदोलनों तथा भारत के राष्ट्रवादी नेताओं के बढ़ते दबाव के कारण भारत सरकार अधिनियम, 1919, जिसे मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा जाता है, के तहत भारतीय महिलाओं को पहली बार कुछ प्रांतों में स्थानीय सरकार के चयन के माध्यम से शासन में भाग लेने हेतु एक सीमिति मताधिकार दिया गया था, लेकिन अंततः भारत सरकार अधिनियम, 1935 द्वारा संपति एवं शैक्षिक योग्यता को पूरा करने वाली महिलाओं को मताधिकार का पूर्ण अधिकार प्रदान करने के साथ ही संवैधानिक तंत्र में उनकी भूमिका को स्वीकार किया गया, और 1950 में स्वाधीन भारत के संविधान के लागू होने तक उत्तरोत्तर महिलाओं को विधायी तथा सार्वजनिक निकायों में शामिल किया जाता रहा।

 

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